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Saturday, October 2, 2010

आस्था के न्याय पर न हो राजनीति

छः दशक के लम्बे इंतजार के बाद अयोद्धया मसले पर आया फैसला सुकून देने वाला है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा दिए गए फैसले से लगभग सभी राजनैतिक दल संतुष्ट नज़र आए। लेकिन फैसले के दो दिन बाद ही समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपनी जुबान खोल बैठे। वह भी ऐसे समय जब फैसले पर दो मुख्य पार्टियां भाजपा और कांग्रेस फैसले से खुश नज़र आ रही हैं। 1990 में अपनी रथ यात्रा से हिन्दुओं में राम भक्ति का अलख जगाने वाले भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी भी अब फैसला आने के बाद उसकी तारीफ करते नहीं थक रहे। यही नहीं फैसले के बाद किसी भी प्रकार की अनहोनी की जो आशंका लगाई जा रही थी वह भी गलत साबित हुई। इससे पता चलता है कि देश की जनता अब अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति काफी सजग हो गई है। वह समझ गई है कि कोई भी सज्जन व्यक्ति चाहें वह किसी भी धर्म का हो उसे आज अपने कामों से फुरसत नहीं है। हां, इतना ज़रूर है कि असामाजिक तत्व ज़रूर शांति में खलल डालने की कोशिश कर सकते हैं।

अब से करीब 18 साल पहले 1992 को बाबरी मस्जिद ढहने के बाद जो हिंसा हुई थी, उसकी चिंगारी राजनीति से ही प्रेरित थी और उसके बाद पूरे देश में इस चिंगारी ने आग का रूप धारण कर लिया था। उस समय मैं बहुत ही छोटा था, लेकिन उस आग में देश किस प्रकार जल रहा था यह मुझे अच्छी तरह याद है। मेरे पापा भी पत्रकार हैं और उस समय कर्फ्यू के दौरान उन्हें रिपोर्टिंग के लिए कर्फ्यू पास मिला हुआ था। उस समय पापा की रिपोर्टिंग की फाइल आज भी मौजूद है। एक बार वो फाइल मेरे हाथ लग गई थी। पापा की वो ख़बरें जो अखबार में छपी थीं, उन्हें पढ़कर एक भयावह द्रश्य मेरी आंखों के सामने आ गया था। जब कोर्ट का फैसला आया तो मैं भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि 1992 फिर से न दोहराया जाए। आख़िरकार फैसला आने के बाद सब कुछ सही सलामत निपट गया। हां, इतना ज़रूर है कि विवादित ज़मीन को तीन हिस्सों में बांटने के फैसले से कुछ लोग ज़रूर नाराज़ हैं, लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि उनमें बदले की भावना कहीं दिखाई नहीं दे रही। वैसे भी जो पक्ष इस फैसले से खुश नहीं हैं उनके पास सुप्रीम कोर्ट में जाने का रास्ता खुला हुआ है।

मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मुलायम सिंह को इस फैसले से क्यों निराशा हुई है? आखिर मुलायम सिंह ने क्यों कहा कि फैसले से मुसलमान खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं? जब कि किसी भी मुसलिम दल ने इस प्रकार की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिर मुलायम सिंह को क्यों ऐसा लगा कि न्यायपालिका ने यह फैसला आस्था को कानून और सबूतों को ऊपर रखकर दिया है? मुलायम सिंह को ऐसा क्यों लग रहा है कि इस फैसले के बाद आगे चलकर अनेक संकट पैदा होंगे? मुलायम सिंह मुसलमानों के प्रति इतने मुलायम कब से हो गए कि उन्होंने कह दिया कि फैसले से पूरे मुसलिम समुदाय में मायूसी है?

पिछले वर्ष मई में मुलायम सिंह के सहयोगी रहे आज़म खान को खुद मुलायम ने पार्टी से छः साल के लिए निकाल दिया। इस पर मुलायम सिंह का तर्क था कि आज़म पार्टी विरोधी काम कर रहे थे। आज़म को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा उन्होंने भाजपा के पूर्व नेता कल्याण सिंह को अपनी पार्टी में शामिल करने का मन बना लिया। पार्टी के सम्मेलनों में मुलायम सिंह कल्याण सिंह को अपने साथ ले जाने लगे। क्या मुलायम सिंह यहां यह भूल गए थे कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे और तब से लेकर अब तक वे मुस्लिमों के निशाने पर हैं। जहां एक तरफ मुलायम सिंह आज़म खान को बाहर कर काफी मुस्लिमों के बुरे बन गए थे, वहीं कल्याण से दोस्ती ने आग में घी का काम कर दिया। मुलायम सिंह के इस रवैये से मुसलिम इतने खफा हुए कि उन्होंने धीरे-धीरे पार्टी से किनारा करना शुरू कर दिया। आखिरकार सपा प्रमुख को अपनी गलती का अहसास हुआ और कल्याण से कन्नी काट ली।

पिछली इन बातों को ध्यान में रख हो सकता है कि वो मुस्लिमों के हितैषी बनने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन उनकी भाषा बदली हुई है। मुलायम सिंह की फैसले पर प्रतिक्रिया के बाद उनकी निंदा मुस्लिमों ने भी ज़ोरदार तरीके से की है। ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य और ईदगाह के नायब इमाम मौलाना रशीद फिरंगी महली ने मुलायम सिंह की प्रतिक्रिया के बाद कहा कि पूरे देश में दोनों समुदाय के के धार्मिक नेताओं, राजनेताओं और मीडिया ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी ज़िम्मेदारी और संयम का परिचय दिया है। किसी को भी ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए जो राजनीति से प्रेरित लगती हो और जिससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका हो। वहीं शिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद मिर्ज़ा अतहर ने मुलायम सिंह के बयान पर आश्चर्य जताया।

मुसलिम-यादव (माई) का फ़ॉर्मूला आजमाने वाले मुलायम सिंह को ऐसे बयान राजनीति में शोभा नहीं देते। मुसलिम समुदाय की ओर से आए इन बयानों के बाद अब मुलायम सिंह को समझ में आ जाना चाहिए कि आज का भारत अब काफी बदल चुका है। साथ ही राजनेताओं को भी फैसले पर अब ऐसी किसी भी प्रकार की टिप्पणी से बचना चाहिए जिससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका हो।

Wednesday, September 15, 2010

कितनी स्थाई होगी झारखंड में आठवीं सरकार

बिहार से 2000 में झारखण्ड के अलग होने के बाद इस बात की उम्मीद लगाई जा रही थी कि विकास से महरूम रहे इस क्षेत्र का शायद अब सही ढंग से विकास हो पाएगा। लेकिन 10 साल में आठ सरकार बनने के बाद भी यहां की जनता को विकास के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। अर्जुन मुंडा के रूप में झारखण्ड की जनता को मिली आठवीं सरकार कितनी स्थाई होकर यहां का विकास करेगी, इस बात को कहना मुश्किल है। झारखण्ड में पिछले दस साल का इतिहास गवाह रहा है कि राज्य का जो भी मुख्यमंत्री बना है उसने सिर्फ इसे लूटा है। या ये कहें कि विकास के नाम पर राजनीति की है।

81 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में पिछले वर्ष दिसंबर में चुनाव हुए। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार किसी एक पार्टी की सरकार बनेगी। लेकिन जब परिणाम आए तो किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इससे साफ़ हो गया कि इस बार भी गठबंधन वाली सरकार ही होगी। वह सरकार जिसकी बुनियाद कमजोर होगी। इस चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ताकत के रूप में उभरा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जेएमएम की ताकत आदिवासी और पिछड़े खासकर महतो समुदाय के लोग हैं। जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन आदिवासी नेता हैं और इनके लिए लगातार आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं। साथ ही इस चुनाव में जेएमएम किंगमेकर के रूप में सामने आई थी। इससे सोरेन का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय था। और हुआ भी यही। 30 दिसंबर को सोरेन राज्य के सातवें मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री के रूप में गुरूजी का यह तीसरा कार्यकाल था। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए के सहयोग से बनी यह सरकार भी लगभग चार महीने बाद ही उस समय अल्पत में आ गई जब भाजपा ने उससे समर्थन वापसी का ऐलान कर दिया। इसका कारण सोरेन खुद बने, क्योंकि उन्होंने भाजपा द्वारा लाए गए बजट कटौती प्रस्ताव के खिलाफ मतदान कर दिया था। यह मतदान सीधे यूपीए सरकार के पक्ष में था। हालांकि दिल्ली से रांची जाते समय इसके लिए सोरेन ने माफ़ी भी मांगी, लेकिन तब-तक देर हो चुकी थी। भाजपा की संसदीय समिति ने सोरेन के इस कदम को गठबंधन धर्म के खिलाफ बताया।

काफी जद्दोज़हद के बाद भी सोरेन भाजपा को मनाने में असफल रहे और अंततः ३० मई को उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। इसके ठीक दो दिन बाद एक जून को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इससे पहले भी यहां करीब एक साल राष्ट्रपति शासन रहा है। करीब तीन महीने राष्ट्रपति शासन रहने के बाद सात दिसंबर को भाजपा ने जेएमएम के साथ मिलकर सरकार बनाने की दावेदारी पेश कर दी। इस बार जेएमएम ने भाजपा को बिना किसी शर्त के समर्थन देने की बात की। आख़िरकार ११ सितंबर को अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में एक और नई सरकार का गठन हो गया। लेकिन जिन राजनीतिक समीकरणों से इस सरकार का गठन हुआ है उन्हें देखते हुए इस सरकार के भविष्य पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। इसका भी मुख्य कारण भाजपा और जेएमएम हैं, क्योंकि दोनों पार्टियों को स्वाभाविक सहयोगी नहीं कहा जा सकता।

नाजुक गठबंधन के बहुमत पर टिकी सरकारों से देश और राज्य अच्छी तरह परिचित हैं। ऐसी सरकारें अस्थिरता के झूले में झूलती नज़र आती हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण झारखण्ड ही है जहां कोई भी सरकार राज्य से दस सालों के इतिहास में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने मुंडा ने बेशक कहा हो कि उनकी यह सरकार स्थिर रहेगी और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगी। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए मुंडा के दावों पर यकीन करना कठिन है।

लौह अयस्क, तांबा अयस्क, कोयला, अभ्रक आदि प्राकृतिक संसाधनों वाले इस राज्य में जो भी सरकारें बनी हैं उन्होंने यहां की जनता को अधिकतर निराश ही किया है। यही नहीं राजनीतिक उठापठक के चलते पिछले कुछ सालों में झारखण्ड में प्रशासन व्यवस्था भी ख़राब हुई है। साथ ही इस राज्य में नक्सल एक बड़ी समस्या है। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के चार हज़ार करोड़ रुपए के स्पेक्ट्रम घोटाले से प्रदेश की छवि ख़राब हुई है। यही नहीं स्थाई सरकार के अभाव में झारखण्ड की विकास दर भी गिरी है, जिससे यह राज्य और ज्यादा पिछड़ गया है। इस समय मुंडा के सामने झारखण्ड को इन हालातों से निकालकर विकास की और ले जाना एक बड़ी चुनौती है। यही नहीं मुंडा की सरकार से यहां के लोगों को काफी अपेक्षाएं हैं। साथ ही मुंडा के लिए यह समय अवसर भुनाने का है। अब देखना यह है कि मुंडा की यह सरकार कितने दिन टिकती है और यहां के विकास के लिए क्या कम करती है।

Saturday, February 6, 2010

इस वायरस का एंटी वायरस कब आएगा?


जब इन्टरनेट भारत में नया-नया आया था, तो लोगों को पता तक नहीं था कि वायरस नाम की कोई चीज कम्प्यूटर को अपना शिकार बना सकती है। खैर, कुछ समय बाद इसकी काट निकाल ली गई और इस वायरस से निपटने के लिए तरह-तरह के एंटी वायरस बाज़ार में आ गए। कम्प्यूटर को तो लोगों ने बचा लिया, लेकिन अपने देश में घुस आए क्षेत्रीयवाद के वायरस से बचने के लिए एंटी वायरस का देश की जनता को अभी तक इंतजार है।

मराठा मानुष नाम का यह वायरस देश में इस तरह अपना घर बना चुका है कि इससे निपटने के लिए सरकार ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। केवल बातों के जरिए ही इस वायरस को ख़त्म करने के हवाई किले बनाए जा रहे हैं। महाराष्ट्र में घुसे इस वायरस ने अपना आतंक इस कदर फैला रखा है कि आम आदमी तो दूर, इससे निपटने के लिए राज्य और केंद्र सरकार भी असहाय नज़र आ रही हैं। 80 के दशक में जब शिव सेना ने मराठी मानुष का राग अलापना शुरू किया था, तभी लोगों को लगने लगा था कि कहीं ऐसा न हो कि आगे चलकर यह राग एक भयंकर रूप ले ले। आज तीन दशक बाद लोगों की समझ में आ गया है कि राजनीतिक खिचड़ी पकाने के लिए राजनेता क्षेत्रीयवाद की आग को भड़का रहे है हैं। चाहें महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे हों या शिव सेना के बाल ठाकरे, दोनों ही समय-समय पर महाराष्ट्र के मराठियों के लिए नए-नए फरमान जारी करते रहते हैं। कभी वे टैक्सी चालकों का मराठी होना ज़रूरी बताते हैं तो कभी वहां की सरकारी नौकरियों पर मराठियों का हक़ होना। यही नहीं ये उत्तर भारतीयों को महाराष्ट्र के विकास में बाधा बताते हुए उन्हें मारते-पीटते रहते हैं। साथ ही उत्तर भारतीयों का हिंदी भाषी होने के कारण इन्हें तरह-तरह की यातनाएं भी दी जाती हैं।

यहां ठाकरे परिवार यह भूल जाता है कि महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई को आर्थिक राजधानी और फिल्म सिटी का दर्जा दिलाने में उत्तर भारतीयों का काफी सहयोग रहा है। एक तरफ जहां शिव सेना और मनसे ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे नस्लीय हमले की विवेचना करते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ अपने ही देश में उत्तर भारतीयों पर हमले करके अपना सीना चौड़ा कर बिंदास घूमते हैं। इन्हें लगता है कि सरकार इन्हीं की है। और हो भी सकता है। जिस प्रकार से इन पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की जाती, उसे देखकर तो यही लगता है। महाराष्ट्र में इन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता सड़कों पर खुलेआम आतंक फैलाते हैं और सरकार हाथ पर हाथ धरे तमाशा देखती रहती है।

यदि हम महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों में दोनों पार्टियों की स्थिति पर नज़र डालें तो शिव सेना के खाते में जहां 45 सीटें हैं, वहीं मनसे के पास मात्र 13 सीटें हैं। पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र की 48 सीटों में से शिव सेना को मात्र 11 सीटें मिलीं, जबकि मनसे का खाता तक नहीं खुल पाया। यहां गौर करने वाली बात है कि मात्र मुट्ठी भर सीट होने पर ये दोनों पार्टियां इस कदर ग़दर मचाती हैं, तो सोचिए अगर केंद्र की लगाम इनके हाथ में हो तो क्या हो सकता है! डर लगता है यह सोचकर कि कहीं भारत महाराष्ट्र न बन जाए। अब समय आ गया है कि क्षेत्रीयवाद की आग फ़ैलाने वाले कोई भी हों, उन्हें कड़ा सबक मिलना चाहिए। साथ ही देश में एक नहीं ऐसे अनेक एंटी वायरस आने चाहिए जो क्षेत्रीयवाद के वायरस को नष्ट कर अमन-चैन फैला सकें, क्योंकि अनेकता में एकता ही अपने देश की पहचान है।