Friday, February 27, 2009

सूरजकुंड मेले का एक दिन


वैसे तो मैं ज्यादा मेले देखने नहीं गया हूँ। मेरे शहर खुर्जा में साल में तीन मेले लगतें हैं। पहला रामलीला का मेला, दूसरा नवरात्री का और तीसरा सावन का मेला। तीनों मेलों का अपना अलग-अलग महत्व है। इन मेलों के अतिरिक्त मैं मुरादाबाद में नुमाइश देखने गया हूँ। जिसका अपना महत्व है। लेकिन जब मैं फरवरी २००९ में फरीदाबाद का सूरजकुंड का मेला देखने गया तो वहां जाकर मुझे लगा कि यह कोई मेला नहीं बल्कि एक ऐसी दुनिया है जिसमें लोगों की संस्कृति को दर्शाया जा रहा है। अपने देश के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों से आए शिल्पकारों ने अपनी कला के जो नमूने पेश किए उन्हें देख कर मैं दंग रह गया।


चूँकि मैं अपने संस्थान की तरफ़ से अपने दोस्तों के साथ गया था। लेकिन वहां पहुँचने के बाद गाँवरुपी सूरजकुंड का वह वातावरण जिसमें अलग-अलग स्टॉलों पर शिल्पकला का रंग बिखरा हुआ था देख कर आश्चर्य हुआ। मुझे यकीं नहीं आ रहा था कि हमारे देश में शिल्प कला ऐसे नमूने हैं जिन्हें देख कर कोई भी हिन्दुस्तानी गर्व से कह सकता है कि मुझे अपने देश पर गर्व है।

कहीं अँगुलियों पर नाचती कठपुतलियां तो कहीं संगमरमर में जड़ित रत्नों से बना ताजमहल। और बाइस्कोप को देखकर तो मैं दंग रह गया। मुझे याद है कि जब मैं कोई आठ-दस साल का था तब बाइस्कोप दिखाने वाला मेरी गली में आया करता था। और मैं मात्र २५ या ५० पैसे में बाइस्कोप देखा करता था। सूरजकुंड मेले में बाइस्कोप वाले को देख मुझसे उसे देखे बिना रूका नहीं गया। लेकिन उस दिन बाइस्कोप वाले ने बाइस्कोप दिखाने के दस रूपये लिए।


एक-एक स्टॉल उस राज्य की कहानी कह रहा था जहाँ से वह था। मध्य-प्रदेश थीम पर आधारित सूरजकुंड का यह मेला दर्शकों को चुम्बक के विपरीत सिरों की तरह अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। कहीं राज्यों के लोक्न्र्त्यों पर थिरकते कदम तो कहीं नगाड़ों पर उठते पैर। इस मेले में मेरे लिए सब कुछ था, कमी थी तो किसी ऐसे साथी की जो उस मेले को मेरे साथ देखता। दोस्त तो थे लेकिन साथी नहीं था। वहां से मैंने कुछ खरीददारी की। खरीदना तो बहुत कुछ चाहता था लेकिन वहां सामान की कीमतों के वजन के मुकाबले मेरे बटुए का वजन हल्का था।


शाम के समय हम लोग वहां से वापस आ गए। अभी भी वह मेला मुझे याद आता है। मैं शुक्रगुजार हूँ अपने संस्थान का कि उसने मुझे इस मेले के जरिये अपने देश कि उस संस्कृति से अवगत कराया जिससे मैं अभी तक महरूम था।

Thursday, February 5, 2009

....और उजड़ गया आँगन का आँचल

बचपन, एक ऐसा समय होता है जिसमें हम अपनी सभी चिंताओं को भूलकर एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जिसमें सिर्फ मौज- मस्ती होती है। और उसी मौज-मस्ती में कुछ ऐसी प्राकृतिक चीजें होती हैं जिन्हें हम उम्र भर नहीं भूलते। मेरे बचपन में भी ऐसी ही एक प्राकृतिक चीज थी जिसे मैंने युवा अवस्था में कदम रखते ही खो दिया। वह था मेरे आँगन में लगा नीम का पेड़। वह नीम का पेड़ जिसके नीचे मैंने अपने बचपन के खट्टे-मीठे अनुभव लिए। उस पेड़ की पत्तियों को लहराते देख जहाँ मैंने हँसना सीखा वहीं उस पेड़ को अपना एक अच्छा दोस्त भी बनाया।

गर्मियों में मुझे अपनी छाँव देने वाला वह पेड़ सर्दियों में भी धूप के लिए अपनी बांहों रूपी टहनियों को खोल दिया करता था। कभी लंगड़ डालना तो कभी उसकी निबोलियों से खेलना। लेकिन वह पेड़ कभी नाराज नहीं होता था। माना कि पतझड़ के मौसम में उसके पत्तों से मम्मी कभी-कभी नाराज हो जाया करती थीं। लेकिन बसंत ऋतु के बाद के उस नए नवेले पेड़ को देख ऐसा लगता था कि मानों यह पेड़ फिर से एक नई पारी के लिए तैयार है। मुझे याद है जब मैं उस पेड़ कि नई कपोलों को यह सोचकर खाता थी कि इससे मेरा खून शुद्ध हो जाएगा। लेकिन उन कपोलों को खाने के बाद जो मेरे मुंह का जो हाल होता था उसे मैं आज तक महसूस करता हूँ।

बारह साल पहले उस पेड़ से मेरी दोस्ती हमेशा के लिए टूट गई। कारण जो भी रहा हो लेकिन आज वो नीम का पेड़ मेरे साथ नहीं है। सालों की वो दोस्ती इक पल में टूट जायेगी ऐसा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। लेकिन कहते हैं न कि उम्मीद भी उन्हीं से टूटती है जिनसे टूटने कि उम्मीद नहीं होती। आज जब भी कभी वह नीम का पेड़ मुझे याद आता है मुझे बचपन का समय याद आ जाता है। मेरे आँगन का वह आँचल जो मुझे हमेशा अपने अन्दर समेटे रहता था आज वह उजड़ गया है और उस आँचल की कमी मुझे आज भी महसूस होती है।

Tuesday, January 6, 2009

डाक बाबू कहाँ हो

१०-१२ साल की उम्र के मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब मैं अपनी नानी के घर जाया करता था। नानी के घर के सामने वाले घर की महिला जब मुझे बुलाकर सऊदी अरब में नौकरी करने वाले अपने पति के लिए चिट्ठियां लिखवाया करती थी। मैं बहुत खुश होकर उसकी चिट्ठी लिखा करता था। यही नहीं जब कभी मेरे घर की गली में डाकिया आता था तो उसे देखकर मन खुशी से उछल जाता था कि शायद उसके पास हमारे लिए भी कोई चिट्ठी हो! और फिल्मों में भी डाकिया जब किसी कि चिट्ठी पढ़कर सुनाता था तो उसके आस-पास लगी भीड़ को देखकर मन रोमांचित हो उठता था। सुख-दुःख का संदेश लेकर आने वाले डाकिया को लोग एक अतिथि का दर्जा देते थे। लेकिन वह अतिथि आज कहाँ है?

तेजी से बढ़ रही सूचना क्रांति ने आज डाकिया के रास्तों को कम कर दिया है। मोबाइल फोन, ई-मेल आदि ने आज चिट्ठियों के अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया है। आज अधिकतर चिट्ठियां या कूरियर केवल नौकरियों से सम्बंधित दस्तावेज या पार्सल ही आते हैं। लेकिन उनको लाने वाले जिन्हें हम डाकिया या कूरियर कम्पनी का कर्मचारी कहते हैं के प्रति वो अतिथि सत्कार नहीं रहा है। सूचना क्रांति ने डाकिया और आम आदमी के बीच वो दूरी बढ़ा दी है जिसकी कम होने की उम्मीदें असंभव सी लग रहीं हैं। लेकिन सच यही है कि पल भर में पहुँचने वाले संदेश आज लेट-लतीफ़ चिट्ठियों पर भारी पड़ रहें है। पुरानी फिल्मों में सुनाई पड़ने वाले गाने जैसे चिट्ठी आई है, वतन से चिट्ठी आई है....., डाकिया डाक लाया.... आदि आज कि फिल्मों से गायब हो चुके हैं। या कहें कि मर चुके हैं। यही नहीं पैरों में चप्पल, कंधे पर थैला, सर पर टोपी और हाथ में साईकिल लेकर चलने वाला डाकिया आज समाज से भी लगभग गायब है। आज कि युवा पीढ़ी सूचना के इस प्रवाह में तेजी से बह रही है। पल भर में संदेश भेजना और प्राप्त करना उसकी आदत बन गई है वह संदेशों का इन्तजार नहीं करती।

भाग-दौड़ भारी इस जिन्दगी में संदेशों ने भी रफ़्तार पकड़ ली है जो कि जिन्दगी कि रफ़्तार से दो कदम आगे चल रहें हैं। लेकिन अंग्रेजी में एक कहावत है,"नो लोंगर नाओ, गोन आर दी डेस।" और यह कहावत ठीक ही है। हो सकता है कि आगे चलकर आने वाली पीढ़ी को शायद डाकिया के बारे में पता ही ना रहे। डाकिया के थैले से लगातार कम हो रहीं चिट्ठियां कहने को विवश करती हैं,"डाकिया बाबू कहाँ हो?" आज भी आँखें गढ़ाए मैं उसी बड़े-बड़े चश्मे वाले डाकिया का इन्तजार करता हूँ। यह इन्तजार है कि लगातार बढ़ता ही जाता है और शायद ये इन्तजार अब इन्तजार ही रहे। मैं अपने अन्दर से उस डाकिया की छवि नहीं भूल सकता। और आज भी कभी-कभी अचानक उसे याद कर लेता हूँ।

कविता

समीर
वो लहराती पेड़ों पर
मचलती खलिहानों में
पूछता उससे
बता तेरा बसेरा कहाँ है?
नित्य आती मेरे पास
निर्जन में
पूछता उससे
बता तेरी डगर क्या है?
मैं अनायास ही उससे कहता
तुम्हारा वरण गान
मधु पूरित है
और तुम्हारा कोमल तन
विश्वस्रज है
तुम्हारा क्षितिज बदन
निशा शयन में
कल्पना की गहराई में
शत-शत गंध वाला होता है
जिसमे मुझे विश्व-वंदन-सार नजर आता है
हे नाम-शोभन समीर
अब तुम बताओ मुझे
उर्ध्व नभ-नग में
तुम्हारा निर्गमन द्वार कहाँ है?
तुम अतुल हो
तुम श्री पावन हो
हे सरोज-दाम
तुम ज्योति सर हो
मेरे चिन्त्य नयनों में
ख्यालों के स्वपन दिखाने वाली
हे रत्न चेतन, हे तापप्रशमन
ह्र्यदय स्पर्शक समीर
अब तो बता दो
तुम्हारा बसेरा कहाँ है?
तुम्हारा बसेरा कहाँ है?

Sunday, January 4, 2009

जूते-जूते का फर्क

जब कभी हम छोटे-छोटे बच्चों को लड़ते देखते हैं तो उस लड़ाई में कभी-कभी बच्चों द्वारा एक दूसरे पर जूता फेंकते हुए भी देख लेते हैं। जूता फेंकते वक्त वे बच्चे उस जूते की अहमियत भूल जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि वे जूते किस कम्पनी के हैं? शायद तुर्की की बेदान शू-कम्पनी के तो नहीं। और यदि हों भी तो उन बच्चों पर क्या फर्क पड़ता है। लेकिन इराकी पत्रकार मुंतजर अल जैदी द्वारा मॉडल नम्बर २७१ के इस कम्पनी के जूते ने पूरी दुनिया में हल्ला रखा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर फैंके गए इस जूते से वो फर्क आ गया है जो बच्चों ने कभी अपनी लड़ाई में एक-दूसरे पर फैंके थे। खैर, वो तो बच्चें हैं लेकिन जैदी तो नहीं! वह उससे क्या सिद्ध करना चाहते थे? कहीं यह तो नहीं कि कम्पनी का यह जूता कितना मजबूत है? उनकी इस टेस्टिंग में वे जूते इतने मजबूत निकले कि शू-कम्पनी के मालिक रमजान बेदान को अपनी कम्पनी में १०० अतिरिक्त कर्मचारी रखने पड़े। आख़िर मॉडल नम्बर २७१ के उस जूते की जो बुश पर फैंका गया था मांग जो बढ़ गई। लेकिन बच्चों के जूते बनाने वाली कम्पनी पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। यह तो जूते-जूते का फर्क है। इसी बात पर मैंने अपने एक दोस्त से हँसते हुए पूछा,"यार क्या तेरा जूता बेदान कम्पनी का है?" तो उसने भी हँसते हुए जबाव दिया,"क्या अमेरिकी राष्ट्रपति बुश अपने देश में आ रहें है?" उसका यह जबाव सुनते ही मैं चौंक गया। फिरउसने अपने जबाव को स्पष्ट करते हुए बताया कि मैं तो सिर्फ़ यह देखना चाहता हूँ कि बुश के आने पर होने वाली प्रेस वार्ता या किसी मीटिंग में कितने लोग जूते पहन कर आते हैं? उसकी यह बात सुन कर मैं मन ही मन मुस्कुराया।
खैर जो भी हो मुंतजर अल जैदी द्वारा बुश पर फैंका गया जूता ऐसे चला कि पूरी दुनिया में राजनीतिक और मीडिया सड़कों पर ट्रैफिक लग गया। जूते कि महिमा जो निकली। कुछ भी हो जूता तो होता ही चलने के लिए है। पैरों में पहनो तो भी चलता है और हाथ में ले लो तो भी। यही नहीं आजकल तो राजनेता भी अपनी राजनीति चलाने के लिए भी जूतों का सहारा लेते हैं। जैसे बसपा प्रमुख मायावती ने लिया था," तिलक,तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार।" यही नहीं राजनीतिक पार्टियों कि सभाओं के दौरान तो कभी-कभी जूता ऐसे चलता है कि जैसे मानो इसका समझौता राजधानी एक्सप्रैस से हो गया हो। ताबड़-तोड़ जूतों की लड़ाई होती है लेकिन वे जूते किस्मत के मारे होते हैं जिन्हें जैदी के जूतों के बराबर प्रसिद्धि नहीं मिलती।

Tuesday, December 23, 2008

जिन्हें आज भी नव वर्ष का इंतजार है.

नई उम्मीदें! नया संकल्प! नए विचार! और इसी के साथ शुरू होता है नया वर्ष। जी हाँ कुछ ऐसी ही उम्मीदों के साथ लोगों ने नए वर्ष के आगमन की तैयारियां एक हफ्ते पहले से शुरू कर दी हैं। २००८ में हुई आतंकवादी घटनाओं को भुलाकर २००९ का बांहें फैलाकर स्वागत करने के इंतजार में खड़े हैं। लेकिन इन लोगों से अलग एक वर्ग ऐसा भी है जो आज भी अपने जीवन के नए वर्ष के आगमन की आँखें गडाकर प्रतीक्षा कर रहा है।

कूड़ा बीनते, चाय की दूकान पर काम करते या सड़कों पर भीख मांगते ये वे बच्चे हैं जिन्होंने नए वर्ष का सवेरा अभी तक नहीं देखा है। सुबह अपने-अपने काम पर जाना और शाम को थकहार कर अगले दिन काम की चिंता में सो जाना इनके जीवन की दिनचर्या बन चुकी है। स्कूली शिक्षा से महरूम इन बच्चों को आज भी उस सुबह का इन्तजार है जो इनके जीवन को खुशियों से भर दे। फूटपाथ को चारपाई और आसमान को चादर बनाकर सोने वाले ये बच्चे अपने लिए दो जून की रोटी के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं।

एक तरफ़ जहाँ देश आर्थिक मामलों में दुनिया में अपनी विशेष पहचान बना रहा है वहीं निवाले के लिए तरसते लोगों की संख्या में भी एजी से बढोत्तरी हो रही है। कूड़ा बीनने वाले बच्चे से जब मैंने नए वर्ष के बारे में पूछा तो उसने बताया कि यह नया साल क्या है? इसमे क्या होता है? उस बच्चे के ये जवाब चोंकाने वाले थे। सरकार द्वारा बच्चों को दी जाने वाली मुफ्त प्राथमिक शिक्षा ऐसे बच्चों पर अपने और अपने परिवार की पेट की आग बुझाने में भारी पड़ रही है। आतंकवादी घटनाओं से बेखौफ ऐसे बच्चों की हर सुबह आतंक से ही शुरू होती है। चाहें वह आतंक लोगों द्वारा उन पर लगाई जाने वाली फटकार का हो या किसी सड़क पर बेमौत मारे जाने का हो।

चेहरे पर बेबसी की झलक और आंखों में नयी किरण की उम्मीद लिए इस वर्ग के बच्चों को आज उस सुबह का इंतजार है जो इनके अंधेरे जीवन को रौशनियों से भर दे तभी इनके लिए नया वर्ष शुरू होगा। जिसमें इनके जीवन की सभी खुशियाँ शामिल होंगी और वे उम्मीदे भी होंगी जो की इनके ख्वाबों को पूरा करेंगी।