Sunday, July 7, 2013

बारिश के बीच यादों का बॉक्स

हवा के झौंके से लहराते हुए पत्तों से नजर हटने का नाम नहीं ले रही है। वह शाखा जिसपर वह कोमल कपोल लगी है, कभी नीचे तो कभी ऊपर की ओर हो रही है। आज हवा में कुछ जानी पहचानी सी खुशबू है। काले-काले बादल भी अपनी आवाज से खुद के होने का प्रमाण दे रहे हैं। प्रकृति के इस रूप को घर की बालकनी में खड़े हुए मैं बस यूं ही निहार रहा हूं। अचानक बारिश की बूंदें मेरा ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। बारिश की वो बूंदें अपने साथ एक बॉक्स को भी ले आई हैं। वह बॉक्स जिसमें मेरे अतीत से जुड़ा यादों का खजाना भरा हुआ है।

हवा के साथ बारिश की खुशबू भी मेरे अतीत की और याद दिला रही है। अतीत की यादों में मैं उस पर कब बैठ जाता हूं, पता ही नहीं चलता। मेरा वह अतीत जहां मेरी और उसकी कहानियों के चर्चे कॉलेज के कोनों-कोनों में हुआ करते थे। और मैं उन चर्चों को सुन सिर्फ मुस्कुरा देता था और उन सपनों के सच होने का इंतजार करने लगता था।

बाहर बारिश की रफ्तार तेज हो चुकी है। मिट्टी की सौंधी-सौंधी महक मुझे उसके और करीब ले जा रही है। मेरी आंखें अभी भी बंद हैं। हां, वो अब मुझे दिखाई दे रही है। ठीक उसी तरह, जैसी वो पहले थी। वो कभी नजरें मिला रही है, तो कभी नजरें चुरा रही है। उसकी वही शरारतें और अपनी सहेलियों के साथ अठखेलियां मुझे नजर आ रही हैं। बारिश यहां भी हो रही है और वहां भी। दोनों बारिशों के बीच में कोई है, तो वो सिर्फ मैं।
लग रहा है कि शायद वो मुझे बुला रही है। वही यादों के झरोखों से। मेरी आंखें अभी भी बंद हैं। बारिश वहां भी और तेज हो गई है। भीग तो वो पहले ही चुकी थी। बस बाल खोलना बाकी थे। गीला बदन उसके सौंदर्य को और निखार रहा है। पेड़ की आढ़ में छिप-छिप कर उसे देखते हुए मैं भी गीला हो गया हूं। हां, छिप-छिप कर, क्योंकि एकतरफा प्यार ऐसा ही होता है।

बर्तनों की खड़खड़ाती आवाज के बीच आंखें खोल मैं वर्तमान में आ गया हूं। यहां बारिश अभी भी हो रही है। यादों का वह बॉक्स मुझे मेरे सामने नजर आ रहा है। बूंदों की आवाज मुझे बार-बार उसके पास जाने के लिए कह रही है। आसमान को घेरे हुए बादल मुझे घूर रहे हैं। मन में एक सवाल है...। एक नहीं, कई सवाल हैं। क्या वहां भी बारिश हो रही होगी...? क्या वो भी बारिश को निहार रही होगी...? क्या उसके पास भी यादों का बॉक्स आया होगा...? क्या वो भी मेरे बारे में सोच रही होगी...? पता नहीं...।

बालकनी में बैठे-बैठे मैं भी बारिश की फुहारों से भीग सा गया हूं। वर्तमान में सिर्फ भूतकाल को महसूस करने के लिए। उसका साथ महसूस करने के लिए। बादल अपना डेरा दूसरी जगह डालने के लिए रवाना हो चुके हैं। बारिश भी उसके पीछे-पीछे चल चुकी है। मेरे यादों के बॉक्स को बारिश अपने साथ लेकर जा रही है। हालांकि बारिश ने उसमें से यादों का थोड़ा सा खजाना मेरे पास छोड़ दिया है।

बादल अभी भी मुझे घूर रहे हैं। लेकिन बारिश मुस्कुरा रही है। शनै: शनै: समय गुजर रहा है। बादल जा चुके हैं। बारिश जा चुकी है। हवा के साथ बारिश की खुशबू अभी भी मेरी सांसों में है। उसकी यादें अभी भी मेरे साथ हैं। हां यादें। क्योंकि समय गुजर जाने पर बचती हैं, तो सिर्फ यादें...।

Tuesday, September 4, 2012

‘इसे पोखा नहीं, पोहा कहते हैं’


मध्यप्रदेश और खासतौर से इंदौर की बात हो और उसमें पोहा-जलेबी शामिल न हो, ऐसा नहीं हो सकता। यदि आप विदेश या अपने राज्य से बाहर जाते हैं, तो आपको अपने शहर के खाने की कमी बहुत महसूस होती है। आखिर जीभ चटोरी जो ठहरी। सितंबर 2009 की बात है। पहली बार जॉब के लिए मध्यप्रदेश आना हुआ। भोपाल स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर सुबहकरीब 7 बजे ट्रेन राजा भोज की नगरी में आ चुकी थी। हम तीन लोग थे।एक मैं और दो मेरे दोस्त, जो दिल्ली से ही मेरे साथ आए थे। स्टेशन से बाहर निकलकर ऑटो पकड़ा और हम चूना भट्टी स्थित कंपनी के गेस्ट हाउस पहुंच गए। अगले दिन ऑफिस का पहला दिन था। मेरे साथ दिल्ली से आए दोस्तों के साथ मैं ऑफिस पहुंचा। रास्ते में कई जगह रेस्टोरेंट्स, ठेलों और चाय आदि की दुकान पर पिचके हुए पीले चावल जैसी चीज को लोगों द्वारा बड़े चाव से खाते देखा। मन में विचार आया। आखिर ये पीली-पीली चीज क्या है? इससे पहले मैंने कभी उसे खाना तो दूर, देखातक नहीं था।
खैर, ऑफिस आया। दोपहर के समय ऑफिस से बाहर घूमने निकला। चूँकि वह मेरा ऑफिस का पहला दिन था, आसपास की चीजों को देखने की उत्सुकता हुई। अभी तक भोपाल या ऑफिस के किसी भी व्यक्ति से मेरी दोस्ती नहीं हो पाई थी। मैं अपने दिल्ली वाले दोस्तों के साथ ऑफिस के बाहर स्थित छोले-भटूरे, छोले-कुलचे, आलू नान आदि बेचने वालों को तलाश कर रहा था। लेकिन मुझे वहां स्थित लगभग हर शॉप पर वही पीले-पीले पिचके हुए चावल दिखाई दे रहे थे। हम लोग कुछ देर घूमने के बाद वापस ऑफिस आ गए और वहां की कैंटीन में बैठकर पेट में कूद रहे चूहों को शांत किया।
भोपाल में एक दिन गुजरने के बाद भी हम इस पीली-पीली चीज के नाम का रहस्य नहीं सुलझा पाए थे। मैं तो क्या, मेरे दोस्त भी इस उलझन में थे की इसका नाम क्या है। अगले दिन मेरी थोड़ी सी दोस्ती ऑफिस में ही काम करने वाले एक व्यक्ति से हो गई। मैंने बातों-बातों में उस व्यक्ति से पूछ लिया कि इस पीली-पीली चीज का नाम क्या है? उसने इसका सही नाम बताया था, लेकिन मेरी समझ में आया ‘पोखा’। कुछ देर के लिए में चक्कर में पड़ गया कि कैसा नाम है इसका! मैंने अपने साथी दोस्तों को बताया कि जिस पीली-पीली चीज को हम कई दिनों से देख रहे हैं, उसका नाम पोखा है।
नया प्रदेश, नया शहर और खाने की कोई नई चीज। मन में इच्छा हुई कि चलो, पोखा खाकर देखते हैं। शाम का समय था। मैं अपने एक दोस्त के साथ ऑफिस से बाहर निकलकर आया। ऑफिस के सामने स्थित एक ठेले पर हम उस पीली-पीली चीज को खाने के लिए पहुंच गए। मैंने वहां पहुंचते ही ठेले वाले से कहा, ‘भाई ये पोखा खिलाना।’ पोखा नाम सुनते ही उसके माथे पर एक शिकन सी आ गई थी। मैंने ध्यान नहीं दिया। करीब दो मिनट बाद मैंने उससे फिर कहा, ‘भाई, पोखा देने में कितना समय लगेगा?’ मेरे इतना कहते ही ठेले वाले ने मुझसे पूछा, ‘क्या आप किसी अन्य शहर से हैं?’ ‘हां’, मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा। यह सुनकर ठेले वाले के चेहरे पर मुस्कान आ गई। मेरी कुछ समझ में नहीं आया। उसने एक प्लेट निकली और उसमें वही पीले-पीले पिचके हुए चावल डाले और उसमें प्याज, हरी मिर्च, कई तरह की नमकीन आदि मिलाते हुए हमें दिए। जब वह हमें प्लेट दे रहा था। उसने अपना हाथ कुछ देर के लिए रोका और बोला, ‘भाईसाहब, इसे पोखा नहीं पोहा कहते हैं।’ आज इंदौर में करीब दो-ढाई साल बिताने के बाद वही पोखा...सॉरी...पोहा मेरी फेवरेट डिशेज में से एक हो गया है।

Sunday, February 13, 2011

एक पत्र मेरी प्रेमिका के नाम

प्रियतमे,
जानता हूं, तुम कुछ नाराज़ हो। और तुम्हारी नाराज़गी भी जायज़ है। आखिर मैंने तुम्हें अभी तक कोई पत्र जो नहीं लिखा। हां, इतना है कि ख्वाबों के पन्नों पर दिल की स्याही से कुछ शब्द ज़रूर लिखे हैं। वे शब्द जो अनदिखे हैं। वे शब्द जो कभी जुबां से बयां नहीं हुए। वे शब्द जो अपने सच होने का इंतजार कर रहे हैं। जानता हूं, तुम मुझसे दूर हो। लेकिन मुझे इसका गम नहीं है। तुम्हारी यादें हर वक्त मेरे साथ रहती हैं। ख्वाबों के इस फ्रेम में तुम्हारी तस्वीर हर समय मेरे साथ रहती है। मेरी सुबह में आज भी तुम्हारे बदन की महक महसूस होती है। जानती हो...मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या सपने सजाए हैं??? वो आसमान की सैर...वो समुद्र का किनारा...और ठंडी-ठंडी हवाओं के बीच सिर्फ मैं और तुम।

कंधे पर टांगने वाला तुम्हारा वो बटुआ, जिसे तुमने कुछ दिनों पहले ख़रीदा था, बहुत सुन्दर है। तुम सोच रही होगी कि मुझे कैसे पता चला? भूल गईं, तुमने मेरे सपने में आकर जो इसे दिखाया था। बटुए का कत्थई रंग तुम्हारे वस्त्रों से मेल खा रहा था। सच कहूं, इस प्रेम-पर्व पर मुझे तुम्हारी काफी याद आ रही है। काश तुम तेरे पास होतीं...काश तुम मेरे साथ होतीं...काश तुम एक हकीकत होतीं। क्या बात है...तुमने अब सपनों में आना कम कर दिया है? क्यों इतनी नाराज़ हो गई हो? तुम्हें याद है बारिश की वो सुबह...जब तुम्हारे भीगे बदन से लिपटी हुई चुनरी पेड़ की शाखा में अटक गई थी। तब तुम कितनी नाराज़ हुईं थीं। तुम्हारे माथे की वो शिकन मुझे आज भी याद है।

इस प्रेम-पर्व पर तुम्हें देने के लिए मैंने खास उपहार खरीदा है। जब तुम मिलोगी, तब दिखाऊंगा। उम्मीद है कि तुम्हें यह उपहार पसंद आएगा। जब तुम सोकर उठती हो, तो क्या अभी भी तुम्हारी जुल्फें सीने से लिपटी हुई होती हैं? कितनी खुशनसीब हैं ना...तुम्हारी जुल्फें। हां...तुम्हारी जुल्फें। बहुत शरारती हैं। जब तुम चलती हो तो तुम्हारे चेहरे पर आकर अठखेलियां करती हैं। जब तुम खड़ी होती हो तो गर्दन पर लिपट जाती हैं। जब तुम नहाती हो तो बदन से चिपक जाती हैं। तुम्हारी आंखों का काजल आज भी तुम्हारे सौंदर्य में चार-चांद लगाता होगा। तुम्हारा वह सौंदर्य जो कुदरत की देन है।

क्या तुम्हें पता, जब कुछ तितलियों ने तुम्हें चारों ओर से घेर लिया था। ऐसी ही एक तितली आज मेरे पास आई। मुझे कुछ दूरी पर बैठी हुई थी। गुमसुम। ना जाने उसे क्या हुआ था...मैं उससे कुछ पूछना चाहता था...कुछ कहना चाहत था...और हां, तुम्हारे पास एक सन्देश भिजवाना चाहता था। जब मैं उसके पास गया वह उड़ गई। लगता है तुम अब मुस्कुरा रही होगी। मेरे भी चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गई है। तुम भी सोच रही होगी कि मैं भी ना जाने इस पत्र में क्या-क्या लिख रहा हूं। बुद्धू, पागल और ना जाने किस-किस नाम से तुम मेरा नाम ले रही होगी। हां...बुद्धू हूं मैं....तुम्हारा बुद्धू... तुम्हारे लिए बुद्धू। मुझे उम्मीद है कि अब तुम्हारी नाराज़गी दूर हो गई होगी। और हां...कोशिश करूंगा कि मैं तुम्हारे लिए पत्र लिखता रहूं। अंत में तुम्हारे लिए एक खास सन्देश, 'मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। इस प्रेम-पर्व की तुम्हें बहुत-बहुत बधाई।'

तुम्हारा...सिर्फ तुम्हारा...
बुद्धू

Tuesday, February 8, 2011

मोहे भी रंग दियो बासंती रंग ने

आज मेरा मन चंचल है। इधर-उधर घूम रही हूं। कभी पेड़ों से टकराती तो कभी फूलों को छूकर निकल जाती। आप लोगों को भी मैं खुद के शरारती होने का अहसास कर रही हूं। क्या करूं...आज मेरा मन चंचल जो है। इस बासंती रंग ने अपने रंग में मुझे भी रंग दिया है। मेरे अन्दर भी प्रेम-भाव की भावना उमंग ले रही है। आज मेरा खुद पर बस नहीं है। ऐसा है इस बसंत का रंग। मैं हवा हूं। कोई राह नहीं। बस चले जा रही हूं। रमे जा रही हूं। इस बासंती रंग में।

पेड़ों पर बौर इस दुनिया में आ चुके हैं। शाखाओं से चिपके हुए। इन्हें इंतजार है खुद के जवान होने का। मैं इन्हें झूला झुला रही हूं। आज प्रकृति भी नए वस्त्रों से सजी हुई है। नई दुल्हन की तरह दिखाई दे रही है। बासंती रंग का खुमार प्रकृति पर भी चढ़ा हुआ है। बच्चे भी खुश दिखाई दे रहे हैं। खेल रहे हैं। कूद रहे है। पतंग उड़ा रहे हैं। मैं इनके कानों में मधुर स्वर घोल रही हूं। ये मेरे होने का अहसास कर रहे हैं। मैं देख रही हूं कि भौंरे फूलों को छेड़ रहे हैं। इनमें भी प्यार की लहरे हिलोरें ले रही हैं। मैं देख रही हूं कि गेहूं की फसल पर सोने की परत ने चढ़ना शुरू कर दिया है। किसान के चेहरे पर हंसी और जानवरों की मस्ती पर भी बासंती रंग चढ़ गया है।

इन सबके बावजूद मुझे कुछ दुःख है। मुझे दुःख है इस बात का कि पूरी मानव प्रजाति खुश नहीं है। इस बसंत ऋतु में काफी लोगों के चेहरे पर मुझे ख़ुशी दिखाई नहीं दे रही है। ये लोग प्रेम-भाव से दूर हैं। मैं देख रही हूं कि कुछ लोग आपस में लड़ रहे हैं। एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। ना जाने क्यों...??? वह प्यार जो कभी एक-दूसरे पर उमड़ता था, कहीं खो गया है। कहीं खो गई हैं वो नज़रें जिनसे कभी मानव एक-दूसरे को देखा करता था। वो नज़रें जिनमें खुशियों भरी चमक होती थी। खो गई हैं गावों की वो चौपालें जिन पर कभी लोगों की हंसी सुनाई देती थी। हुक्कों की गडगडाहट सुनाई देती थी। अब तो गावों की चौपाल से चारपाई भी गायब होने लगी है।

इस प्यार भरे मौसम में मुझे लोगों के बीच प्यार कम या ये कहूं कि दिखाई ही नहीं दे रहा है। और मैं हूं कि इस बासंती रंग में पागल हो रही हूं। लोग इस मौसम का सिर्फ मजा ले रहे हैं। समझ नहीं रहे। वे नहीं समझ रहे कि हम एक-दूसरे की बीच की दूरियों को मिटा दें। हम मिटा दें वो फासले जिन्होंने एक दीवार का रूप ले लिया है। वे दीवारें जिन्होंने लोगों के बीच प्यार को कम कर दिया है। वह प्यार जो हमारे देश की एकता और अखंडता को एक डोर में बांधे रखता है। मुझे दुःख होता है यह देखकर कि आज मानव मानवता को भूलता जा रहा है।

मुझे एक कटती हुई पतंग दिखाई दे रही है। इधर-उधर उड़ रही है। मुझे इसे सहारा देने की ज़रुरत है। आखिर यह कटी पतंग कब तक मेरी बाहों में रहेगी। कटने के बाद इसे आना तो ज़मीन पर ही होगा। काश! यह कटी न होती...काश! यह डोर से बंधी हुई होती...इसी कटी पतंग की तरह एक दिन मानव भी ज़मीन पर आ गिरेगा। यदि इसे बुलंद रहना है तो प्यार के डोर में बंधे रहने होगा। मेरा क्या है...मैं आज इधर तो कल उधर...बासंती मौसम भी कुछ समय बाद चला जाएगा। यह चला जाएगा एक संदेश देकर। वह संदेश को प्यार भरा है...उमंग भरा है...शरारत भरा है...

Thursday, February 3, 2011

दीवार पर हवाई जहाज आज भी बनता है

याद करो बचपन का वो ज़माना, जब सर्दियों में रात को बिस्तर पर लेटे हुए छत और दीवारों पर नज़र पड़ती थी। कमरे की वो दीवारें जिन पर अजीब सी आकृतियां नज़र आती थीं। कभी हाथी, कभी घोड़ा, कभी अपने देश का नक्शा तो कभी उड़ता हुआ हवाई जहाज। हां...हवाई जहाज। और ऐसी ना जाने कितनी आकृतियां हमें कमरे की उन दीवारों पर नज़र आती थीं। वह दीवारें जिनसे पुताई की पपड़ियां छूट रही होती थीं। वह दीवारें जिन पर बारिश के पानी की सीलन आती थी। मेरे घर के वो कमरे आज भी वही हैं। कुछ कमरे और बन गए हैं। बारिश के बाद दीवार पर सीलन आज भी रहती है। पपड़ी आज भी छुटती है। और...हां...हवाई जहाज आज भी बनता है।

समय अपने बदलने का अहसास करा चुका है। समय के साथ हवाई जहाज की भी स्पीड बढ़ चुकी है। वह हवाई जहाज मेरे घर से करीब एक हजार किलोमीटर की दूरी तय कर अब इंदौर में आ गया है। यहां मेरे कमरे की दीवारों पर ना तो सीलन है और ना ही उनसे छुटती पपड़ी। लेकिन वो हवाई जहाज...हां वही... मेरे घर वाला, आज भी कभी-कभी दीवारों पर नज़र आ जाता है। अब यह कुछ शोर करने लगा है। वापस उसी दीवार पर जाना चाहता है। वह दीवार जो मेरे घर पर है। वह दीवार जो इसका एअरपोर्ट है। और मेरी नज़रें इसका ईंधन। अब इसे कौन समझाए कि समय बहुत आगे निकल चुका है। हां, इतना आगे कि इस जहाज को वापस एअरपोर्ट पर पहुंचना नामुमकिन है।

हवाई जहाज के साथ में दीवारों पर हाथी-घोड़े को भी तलाश करता हूं। ये अब दिखाई नहीं देते। लगता है इन्होंने साथ छोड़ दिया है। और हो भी क्यों ना...आखिर जिंदगी में साथ होता ही किसका है। और यदि हो भी तो कितने दिन का???? हां इतना ज़रूर है कि यह हवाई जहाज मुझे मेरे घर की याद दिलाता है। अपने एअरपोर्ट की याद दिलाता है। और याद दिलाता है मेरा वो अतीत जिसे मैंने बहुत पीछे छोड़ दिया है। समय अपनी रफ़्तार को और अधिक बढ़ा चुका है। मैं इस हवाई जहाज से आगे निकलना चाहता हूं। इतना आगे कि इसकी परछाईं भी मुझे दिखाई ना दे। मैं अपने अतीत में ना पहुंच पाऊं। जैसे मुझे हाथी और घोड़ों ने छोड़ दिया ऐसे ही मैं अब इसे छोड़ना चाहता हूंमुझे अब मेरे सपनों के हवाई जहाज की ज़रुरत है। वह हवाई जहाज जिस पर मेरे सपनों के पंख लगे हुए हैं। मेरे वह सपने जो मेरा भविष्य हैं। वह भविष्य जो मेरा है

काफी रात हो चुकी है
। नींद मुझे अपने आगोश में ले रही है। कमरे की जलती हुई लाइट मुझे परेशान कर रही है। मच्छरों ने भी अपना म्यूजिक शुरू कर दिया है। ऐसे म्यूजिक जिसे मैं तो क्या आप भी सुनना पसंद नहीं करेंगेलेकिन सामने की दीवार पर वह हवाई जहाज मुझे अभी भी दिखाई दे रहा है। शोर करता हुआ। इन सबका एक ही समाधान है कि मैं नींद के आगोश में चला जाऊं। अगली सुबह एक नए जोश, नई उम्मीद और अपने सपने की ओर कदम बढ़ाने के लिए। मैं अब इस हवाई जहाज को आज की रात के लिए दूर कर रहा हूंहां...आज की रात के लिए, क्योंकि पता नहीं ये शायद कल रात फिर मेरे कमरे की दीवार पर फिर आ जाए

Monday, January 31, 2011

दिल करता है आज फिर 'बच्चा' बन जाऊं

आजकल दिल में एक अजीब सी बैचेनी होती है। रह-रह कर बचपन का समय याद आता है। सुबह उठते ही पड़ोस में रहने वाले मुनीम जी के घर पर दस्तक देता था। और नानी के गांव में एक प्राइमरी स्कूल में करीब दो महीने की पढ़ाई। गांव में लहलहाते खेत और अपने शहर में रात को आसमान में उड़ते हवाई जहाजों की लाइट देख शोर मचाना। इन बातों को याद कर दिल कह उठता है कि मैं आज फिर बच्चा बन जाऊं। लौट जाए यह समय। पहुंचा दे उस दुनिया में जहां कोई फ़िक्र नहीं थी। गांव के उस स्कूल से छुट्टी के समय घर तक की करीब 20 मिनट की दूरी एक घंटे में पूरी करना। रास्ते में पड़ने वाले बाग़ के पेड़ों से फल तोड़ना। जब बाग़ का माली हमें देखता तो उसे देख वहां से या तो रफूचक्कर हो जाना या किसी पेड़ की आड़ में छिप जाना।

मुझे याद हैं बारिश के वो दिन, जब मेरी गली में कुछ पानी भर जाता था। उस पानी में कागज़ की कश्ती का हिचकोले लेना। नानी के यहां दूध की हांडी से चुपके-चुपके मलाई खाना। लेकिन पकड़े जाने पर डांट भी खूब पड़ती थी। 25 या 50 पैसे में पूरे दिन दुकान से चीज लेकर खाना। कभी-कभी जब एक रुपया मिल जाता, तो हमसे बड़ा शहंशाह कोई नहीं। मुझे याद है तौलिए में मक्के की रोटी के साथ चावल की खिचड़ी बांधकर खेत पर ले जाना। सावन के महीने में पेड़ों पर रस्सी डालकर झूला झूलना। मन करता था कि पेंग बढ़ाकर नभ को छू लूं। पर आसमान भी शरारती। खुद को और ऊंचा कर लेता।

मुझे आज बचपन का वह जमाना याद आता है। शहर में मेरे घर की गली अभी भी वही है। बारिश भी होती है, लेकिन पानी नहीं भरता। मेरे साथ गली भी जवान हो गई है। जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही बचपन को छोड़ दिया। नहीं छूटीं तो यादें। हां...यादें। वो यादें जो आज भी मेरे ज़हन में रहती हैं।

रात को ऑफिस से आने के बाद नींद जल्दी नहीं आती। लेकिन बचपन में शाम होते ही नींद अपने आगोश में ले लेती थी। पेड़ों पर चिड़ियाओं ने भी चहचहाना कम कर दिया है। या यह कहूं कि बंद कर दिया है। गांव के वो खेत आज भी वही हैं। बदला है तो सिर्फ खेत का कुआं। वह कुआं जिसमें दोस्तों के साथ मिट्टी के कंकड़ों से निशाना लगाते थे।

मुझे याद है मेरी गली में वो बाइस्कोप और खिलौने वाले का आना। 25 या 50 या एक रोटी में बाइस्कोप दिखाता था। गाने की फरमाइश अमिताभ या मिथुन की फिल्म की होती थी। बदलते समय से साथ वह बाइस्कोप वाला भी कहीं खो गया है। बचा है तो सिर्फ उसका नाम। गर्मियों की रात में गली के बच्चों के साथ खेलना। जब लाइट चली जाती थी तो आइस-पाइस (हाइड एंड सीक) खेलने का मजा दोगुना हो जाता था।

आज की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में वो बचपन मीलों पीछे छूट गया है। सामने कुछ जिम्मेदारियां बाहें फैलाए खड़ी हैं। आखिर बचपन का साथ होता ही कितना है। यही आठ-दस साल। इसके बाद तो सिर्फ उसकी यादों का साथ होता है। वह यादें जिन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता। वह यादें जिनका उदाहरण जवानी में आकर बच्चों को दिया जाता है। आज जब कभी दोस्तों के साथ महफ़िल में उन यादों को याद करता हूं तो दिल उठता है, 'आज मैं फिर से बच्चा बन जाऊं...फिर से बच्चा बन जाऊं।'

Saturday, December 11, 2010

अनकही नज़रें

या तो वह उदास थी, या उसे कोई परेशान कर रहा था। उसके माथे की शिकन मुझे इस बात का आभास करा रही थी कि वो बैचेन है। कभी अपने हाथ की उंगलियों को मरोड़ती तो कभी अपनी नज़रों से इधर-उधर देखती। अपनी नज़रें चुराकर मैंने कई बार उसकी ओर देखा। कई बार उससे नज़रें मिलीं। वह मुझे गुस्से में दिखी। कुछ देर बाद मेरे पास आई और मुझे छूकर बहुत तेजी से निकल गई। मैं उसे पकड़ पता उससे पहले ही उसकी मां वहां आ गई थी।

'तुम यहां क्या कर रही हो?' उसकी मां ने डांट लगाते हुए उससे कहा। वह सिर्फ मुस्कुराई। कुछ नहीं बोली और अपनी मां के आंचल से लिपट गई। मैं टकटकी लगाए यह सब देख रहा था। न जाने क्या हुआ था उसे। उसने मेरी ओर एक नज़र देखा और अजीब सा मुंह बनाया। हाथों से कुछ इशारा भी किया, लेकिन मैं समझ नहीं पाया।

'भाईसाहब आपकी चाय', चाय वाले ने चाय का गिलास मेरी ओर करते हुए कहा। मैंने चाय की एक चुस्की ली। वो अभी भी मेरी ओर देख रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कि मानों वो मुझसे कुछ कहना चाहती हो।
'भाईसाहब, लगता है आपको बाज़ार से शकर सस्ती मिलती है?', मैंने उसकी ओर से अपनी नज़रें हटाते हुए चाय वाले से कहा।
'नहीं साहब, ऐसा नहीं है। क्या हुआ। तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो?', चाय वाले ने मुझसे पूछा।
'आपकी चाय इतनी मीठी जो है,' मैंने उसे हंसते हुए जवाब दिया।

वह अभी भी अपनी मां के साथ थी। मेरी चाय भी ख़त्म होने वाली थी। तभी उसकी मां उसे लेकर मेरे पास आई और बोली,'बाबूजी...'
उस लड़की की नज़रें अब बड़ी मासूमियत से मेरी ओर देख रही थीं। मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और उसे दे दिए। मैं वापस अपने कमरे पर आ चुका था। रास्ते में सोचता रहा कि वह चार-पांच साल की लड़की जिसके बाल बिखरे हुए और तन कर नाममात्र कपड़े, अपनी मां से कितना प्यार करती है। यह जानते हुए भी कि उसका जीवन दूसरों पर निर्भर है। इतना प्यार हम दूसरों से करें, तो अपने साथ दूसरों का भी जीवन बदल सकते हैं।