Friday, November 10, 2017

एक झक्कास सा लौंडा चाहिए...शादी के लिए


    पहले मैं यहां एक बात क्लियर कर दूं। शादी का सीजन है। इसलिए दिखावे पर मत जाना...अपनी अकल लगाना। हमारे पड़ोस के शर्माजी हैं। सूखे से। जोर से फूंक मार दो तो उड़ जाएं। वो मकर संक्रांति पर पतंग नहीं उड़ाते। एक दिन गिरने से बच गए। बोले- हवा का झोंका तेज था। 


     और उनकी शर्माइन हैं। बिल्कुल माधुरी दीक्षित। हां जी। सई के रियाऊं। माधुरी की बहुत बड़ी फैन हैं। चॉकलेट, लाइमजूस, आइसक्रीम, टॉफियां...वो अभी भी सब खाती हैं। कहती हैं- वक्त बदला है, मैं नहीं। और उस घर में है उनकी सुंदर सी...। रुको। सुंदर सा शब्द सुना नहीं और लार टपकने लगी। सुंदर सी के और भी अर्थ होते हैं जनाब...। वो सुंदर सी है उनके घर की कुतिया। सावधान...! 'कुतिया' शब्द के प्रयोग के लिए पेटा वालों से माफी मांग लेना। अब ये मत पूछना कि पेटा वाले कौन...। गूगल बाबा की मदद ले लो। जवाब के साथ आशीर्वाद भी दे देंगे। ज्ञान का भंडार है उनके पास।
    

    उनके घर एक और सुंदर फीमेल है। हां...। अब सही जा रिएओ मियां। शर्माजी की सुंदर सी बेटी। कुछ सोचने से पहले जनता कृप्या ध्यान दे। दिमाग की बत्ती तीन वाट की एलईडी से ज्यादा जली, तो वो उठाकर पटक देगी। ब्लैक बेल्ट धारी है वो। कराटे में। चों...हेकड़ी निकल गई। निकल गई हेकड़ी। शर्माजी अपनी बेटी की शादी के लिए एक झक्कास का लौंडा ढूंढ़ रहे हैं। पड़ोसियों को भी विज्ञापन वाली खबर दे दी। कुछ रिश्ते आए भी हैं। यकीन नहीं मानोगे। रिश्ते कम, लौंडे ज्यादा आए। झक्कास वाले नहीं।
 

    एक भाई साहब सुबह-सुबह आ गए। कंधे पर बैग टांगे हुए। मेट्रो स्टेशन से सीधे घर पहुंचे। घंटी बजाई। यहां एक बार फिर से सावधान...! यहां अक्षय कुमार नहीं थे, जो बोलते- तुम घंटी बजाओ मैं......। तुम भी खाली जगह छोड़ दो। खबरें पढ़ते होगे तो समझ गए होगे। काम की बात पर आते हैं। घंटी बजते ही अंदर से सुरीली आवाज आई। अहा...! फिर दिमाग की एलईडी जली। सुनो, कुतिया की आवाज आई...। कान-फ्यूज। थोड़ी देर बाद शर्माजी ने दरवाजा खोला। इतनी देर में बेचारा वो व्यक्ति 50 सिगरेट पी गया। गंदी सोच। टोपा हो का...। स्मॉग में बाहर खड़ा था। दिल्ली की प्रदूषित हवा में। समझे मास्टर जी।
 

    शर्माजी ने छोटे से इंट्रोडक्शन के बाद उस बेचारे को अंदर बुला लिया। बातचीत शुरू हुई। बोले इंजीनियर हैं। सुबह जाते हैं। रात को आते हैं। शर्माजी ने पूछ लिया। इतने टाइम करते क्या हो? इंजीनियर साहब बोले- मीटिंग, काम कम काम की बातें ज्यादा, काम की फिक्र ज्यादा, जो काम करता है उसके ऊंगली करना और जो नहीं करता है उसकी बॉस से शिकायत करना...। घर में सन्नाटा छा गया।
 

    शर्माजी हैरान परेशान। सोचने लगे कैसा लौंडा है ये। इससे तो इंदौर वाला ही ठीक था। पोहे-जलेबी बेचता था। जीरावन डाल के। अच्छा-खासा कमा लेता था। सुबह-सुबह ग्राहकों की लाइन लगी रहती थी। पांच-छह घंटे के काम के बाद आराम से घर पर। फिर मौज करो या मस्ती। मेरी बेटी भी उसके साथ खुश रहती। तभी इंजीनियर साहब का मोबाइल बज गया। हम तुम्हे चाहते हैं ऐसे...। यह मोबाइल की रिंगटोन थी। नजर उनकी बेटी पर पड़ी। थोड़ से मुस्कुराए। बेचारी शर्माजी की बेटी का बुरा हाल था। बहुत देर से सहन कर रही थी। इंजीनियर साहब मोबाइल उठा पाते, उससे पहले ही सुंदर सी बेटी उखड़ गई। बोली- उठ...। खड़ा हो...। भाग जा यहां से। मुझे नहीं करनी तुझ जैसे लौंडे के साथ शादी। मैं हैप्पी हूं और हैप्पी भाग जाएगी।

Monday, February 20, 2017

वेद प्रकाश शर्मा...सफेद कार पर हाथ रखकर तुम्हारा खड़े होना...वो तस्वीर आज भी जहन में है

          अगर आप 70-80 के दशक में पैदा हुए हैं और नॉवेल पढ़ने का शौक रहा है, तो वेद प्रकाश शर्मा के नाम से वाफिक होंगे। मेरा जन्म 80 के दशक में हुआ और वेद प्रकाश शर्मा को अच्छे से जानता हूं। और उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ को तो बिल्कुल नहीं भूल सकता। हालांकि वो बात अलग है कि अब उसकी स्टोरी याद नहीं है, लेकिन ये श्योर है कि उसे पढ़ने में मुझे करीब एक सप्ताह लग गया था।
          बाद उस दौर की है जब मेरी उम्र 12-13 साल की थी। वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास ‘वर्दी वाला गुंडा’ उस समय नया-नया मार्केट में आया था। इस नॉवेल के लिए लोगों की दीवानगी देखते ही बन रही थी। एक दिन मैं अपने घर के आंगन में परिवार के साथ था। पापा एक किताब लाए। उसमें वेद प्रकाश शर्मा का उनकी शोहरत से संबंधित एक आर्टिकल छपा था। पापा वेद प्रकाश शर्मा की तस्वीर की ओर इशारा कर मुझे दिखाते हुए बोले- राजेश, इन्हें जानते हो?
          मुझे उस समय नहीं पता था कि यह शख्स कौन है। इसलिए मैंने पापा को मना कर दिया। मैंने वो आर्टिकल नहीं पढ़ा था, लेकिन तस्वीर अभी भी जहन में है। उस तस्वीर में वेद प्रकाश शर्मा अपनी सफेद रंग की कार पर हाथ रखकर खड़े हुए थे। उनके चेहरे की मुस्कुराहट उनके आत्मविश्वास को बता रही थी। उस समय नहीं पता था कि लुगदी कागज का यह लेखक आगे चलकर महान नॉवेलिस्ट बनने वाला है। वेद प्रकाश शर्मा के ही एक प्रशंसक मेरी ही कॉलोनी में रहने वाले एक भईया भी थे। मैंने उन्हें वेद प्रकाश शर्मा के नॉवेल किताबों की दुकान पर पढ़ते हुए देखा है।
          यह वो दौर था, जब बुक सेलर किताबों या नॉवेल को बेचते थे या पहचान वाले व्यक्ति को किराए पर देते थे। यदि जान-पहचान नहीं है, तो आपको उसकी ही दुकान पर बैठकर पढ़ना होगा। और जनाब...लुगदी वाले नॉवेल एक दिन में नहीं पढ़े जाते थे, वे नॉवेल समय मांगते थे। उनमें एक क्यूरिसिटी होती थी। एक रोमांच होता था। कैरेक्टर्स के दिमाग में काल्पनिक चित्र बनते थे। शब्दों में लिखा एक्शन फिल्म की तरह दिमाग में चलता था।
          समय गुजरता गया। उम्र भी बढ़ती गई। करीब बीस साल बाद वेद प्रकाश शर्मा फिर से चर्चाओं में थे। लेकिन दुखद समाचार के लिए। वो अब इस दुनिया में नहीं रहे। आपके जाने के बाद आपके बारे में बहुत सारा पढ़ा। सोचा बहुत सारा लिखूं। लेकिन अतीत के झरोखों को याद कर शब्द कम पड़ गए। रह-रहकर तुम्हारी वही कार वाली तस्वीर जहन में और चेहरे की मुस्कुराहट आंखों के सामने आ रही थी। इन बीस सालों में मैंने कई उपन्यास पढ़े। लुगदी वाले उपन्यास समेत आज के दौर के कई लेखकों के बारे में भी पढ़ा। नॉवेल की कहानी पर फिल्में आज भी बनती हैं। लेकिन कोई वेद प्रकाश शर्मा नहीं बन पाया और न ही बन पाएगा।
          अंतिम लाइन...भगवान आपकी आत्मा को शांति दे। आपके उपन्यास आगे भी पढ़े जाएंगे।

Wednesday, September 7, 2016

बारिश के बीच 90 मिनट

          ‘क्या...? फुटबॉल खेलने चलना है...? ऐसी बारिश में...?’ जिंदगी में पहली बार फुटबॉल खेलने के लिए मेरे मुंह से निकले ये पहले शब्द थे। उस उम्र में नहीं पता था कि फुटबॉल कितनी देर के लिए खेला जाता है। इसकी एबीसीडी क्या होती हैं? वगैरह...वगैरह..। बस ये पता था कि फुटबॉल को लात मारनी है और एक बिना जाल वाले घेरे (गोल पोस्ट) के अंदर पहुंचानी है। बिना जाल वाला इसलिए कि बस फुटबॉल खेलना था...टूर्नामेंट नहीं।
          ‘जूते नहीं पहनेगा क्या?’, मेरे एक साथी ने मुझसे पूछ लिया।
          ‘नहीं यार...गिर गया तो...?, मैंने भी अपने होठों को अंग्रेजी के लेटर ‘ओ’ का आकार बनाते हुए कह दिया (सॉरी...लेकिन आप ये आकार न बनाएं। अजीब लगता है)। टीम कितने लोगों की होती है, यह भी नहीं पता था। क्रिकेट थोड़े ही खेलने जा रहे थे, जो साथ चलने वाले दोस्तों से बोलना पड़ता, ‘अरे यार 22 में दो की कमी है। कौन नहीं आया...? सोनू और रवि तो हैं ही नहीं। चलो उन्हें भी बुलाकर लाते हैं।’ यह फुटबॉल है जनाब और अभी क्रिकेट की तरह हम भारतीयों की नसों में नहीं घुसा है। शायद थोड़ा समय लगेगा...शायद ज्यादा...!
          खैर, उस दिन हम बच्चों और बड़ों की टीम में कितने सदस्य थे यह तो नहीं पता। बस इतना पता है कि हमने एक दोस्त की फुटबॉल ली और बारिश में भीगते हुए कुछ दूरी पर मौजूद मैदान पहुंच गए। बारिश की बूंदों के बीच टीम का बंटवारा हो चुका था। उम्र और लंबाई में बड़े कुछ लोग बच्चा पार्टी के साथ आधे-आधे बंट गए थे। गेम शुरू हो चुका था। खेलने के नियम-कानूनों से अनजान लक्ष्य बस एक था। बॉल (चलो ठीक है...फुटबॉल) को पैरों से मारते बस इतना करना था कि वह दूसरे छोर पर मौजूद दो र्इंटों के बीच में से निकल जाए। र्इंटों के बीच से निकल जाए...! हां, क्योंकि हमारे लिए वहीं गोल पोस्ट थीं।
          आसान सा दिखने वाला काम आसान नहीं था। न मेरे लिए और न मेरे बाकी साथियों के लिए। विकेट और रनों की पिच पर दौड़ने वाले पैर फुटबॉल पर थे। बस दौड़ना था। बारिश की बूंदों के बीच। 90...80...70...कितने मिनट...पता नहीं। चेहरे पर हंसी आने तक खेलना था। और हंसी तभी आती थी, जब फुटबॉल र्इंटों के बीच में से पार हो जाती थी। जीतने का अंतर क्या था, यह भी नहीं पता था। क्योंकि जीत मैच के बाद हो रही चर्चाओं में शामिल थी। वह चर्चा जो बारिश की बूंदों के थमने के बाद शुरू हुई थी।
          ‘तुझसे तो भागा ही नहीं जा रहा था।...और देखो मार कहां रहा था और फुटबॉल जा कहां रही थी...।’ मैच के बाद हमारी चर्चाओं में से एक लाइन ऐसी भी थी। कौन जीता...? पता नहीं। कौन हारा...ये भी नहीं पता। बस एक चीज पता थी। बारिश के बीच फुटबॉल खेलते हुए वो 90 मिनट (काल्पनिक) जिंदगी के सबसे खुशनुमा पलों में से एक थे। वे पल जो अब कहानी का रूप ले लेते हैं। वे कहानियां, जो या तो किताबों में सिमट जाती हैं या इंटरनेट की दुनिया में खो जाती हैं। और जब कभी किसी प्लेटफॉर्म की ओर से ऐसे पलों को जिंदा करने के खास मौके मिलते हैं, तो ये कब्र खोदकर खुशी-खुशी बाहर आ जाते हैं।

Friday, August 22, 2014

स्कूल और जिंदगी का कैमिकल लोचा

कैमिकल यानी एसिड किस चिड़िया का नाम होता है, बचपन में इससे बिल्कुल अनजान थे। प्राइमरी स्कूल की आजादी से सेकेंडरी स्कूल के सख्त नियमों में कैद हो चुके थे। पानी पीने के लिए क्लास से कुछ दूर लगे हैंडपंप के पास जाना पड़ता था। यह हैंडपंप 11वीं-12वीं क्लास के स्टूडेंट्स की कैमिस्ट्री लैब के सामने स्थित था। जैसे ही उस हैंडपंप पर पानी पीने के लिए जाते थे, ऐसा लगता था जैसे मानों किसी ने नाक में छुरी डाल दी हो। सांस लेने और पानी पीने के लिए सिर्फ मुंह ही सहारा होता था। लैब के दरवाजे और खुली खिड़कियों से अंदर झांककर यह देखने की कई बार कोशिश की कि आखिर नाक में छुरी जैसी चलने वाली बदबू आने का क्या कारण है। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात जैसा रहा। कुछ दोस्त यह कहते थे कि यह कैमिस्ट्री लैब है। यहां बड़ी क्लास के स्टूडेंट प्रयोग करने आते हैं। मन में यही था कि हम कब बड़े होंगे और इस लैब में आकर इस बदबू का कारण खोजेंगे। लेकिन सोचते थे कि बेटा इसके लिए कम से कम पांच साल इंतजार करना पड़ेगा।

तीन साल बाद कक्षा नौवीं में आने के दौरान आर्ट्स, कॉमर्स और साइंस ग्रुप में से किसी एक का चुनाव करना था। विजन साफ था...साइंस। क्लासें लगना शुरू हो गई थीं। फिजिक्स और कैमिस्ट्री पढ़ाने की जिम्मेदारी एक ही टीचर को मिली थी।

‘कल सभी बच्चे प्रैक्टिकल की बुक ले आएं। परसों से प्रैक्टिकल क्लासें चलेंगी। और हां, ये क्लासें लैब में होंगी’, साइंस पढ़ाने वाले टीचर ने क्लास में बैठे सभी स्टूडेंट्स से कहा।

सर की यह बात सुनकर उत्सुकता तो बढ़ी थी, लेकिन उतनी नहीं थी जितनी 11वीं-12वीं की कैमिस्ट्री लैब में जाने की थी। 9वीं-10वीं क्लास के स्टूडेंट्स की प्रैक्टिकल लैब 11वीं-12वीं क्लास के स्टूडेंट्स की प्रैक्टिकल लैब के मुकाबले छोटी थी। लेकिन उत्सुकता थी लैब और एसिड नामक चिड़िया को देखने की।

‘यार ये दिल (डीआईएल) और कॉन्स (सीओएन) का मतलब क्या है?’, एसिड नामक चिड़ियाओं को देखने के बाद मैंने अपने ही एक दोस्त से सवाल पूछा।

जब मैं पहली बार लैब में घुसा था, तो वहां पारदर्शी कांच की बहुत सारी बोतलों में भिन्न-भिन्न एसिड भरे हुए थे। मैं सिर्फ कुछ एसिडों के बारे में जानता था। अधिकतर का मैंने नाम तक नहीं सुना था। इनमें से कुछ बोतलों पर एसिड के नाम के साथ अंग्रेजी में डीआईएल और सीओएन लिखा हुआ था। दरअसल एसिड दो रूप में होता है- तनु और सांद्र। तनु को अंग्रेजी में डायल्यूट और सांद्र को अंग्रेजी में कन्संट्रेड कहते हैं। डीआईएल डायल्यूट की शॉर्ट फॉर्म और कॉन्स कन्संट्रेड की शॉर्ट फॉर्म होती है। दिल और कॉन्स के बारे में मेरे दोस्त को भी कुछ नहीं पता था। आखिर कुछ समय बाद मैंने इसके बारे में पता लगा लिया।

एसिड नामक इन चिड़ियाओं को छूने में भी डर लग रहा था। सुना और पढ़ा था कि अगर एसिड नामक चिड़िया काट ले, तो वह स्थान जल जाता है। मुझे अपनी जिंदगी के जलने से डर लग रहा था। कक्षा छठी में पढ़ने के दौरान आने वाली बदबू के बारे में मैं 11वीं में उस लैब में आने से पहले ही जान गया था। मैं समझ गया था कि एसिड नामक चिड़िया से आने वाली यह बदबू आगे चलकर जिंदगी को एक संदेश देने जा रही थी।

अब वर्तमान में आते हैं-
उम्र का 30वां पड़ाव पार करने के बाद कुछ चीजों का अहसास होने लगा है। बचपन में डराने वाला एसिड आज जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है, या ये कहें कि जिंदगी कैमिकल लोचा हो गई है। एसिड का नाम सुनते ही कई बार इसकी शिकार बन चुकीं लक्ष्मी जैसी कई युवतियों का चेहरा सामने आ जाता है। संघर्ष से शुरू हुई जिंदगी आज भी संघर्ष पर ही है। लेकिन न हारने वाली हिम्मत शरीर को नई ऊर्जा दे जाती है। जब जिंदगी जीने का नाम है, तो समाज से छिपकर क्यों जीएं। लोगों को प्रेरित करें कि वो इन बुराइयों से लड़ें और जिंदगी को नए अंदाज में खुलकर जीएं।

Wednesday, August 6, 2014

अलविदा प्राण साहब...दिल में रहेंगे चाचा चौधरी और साबू

आंखें भर आने का राज किसी को नहीं पता था। आॅफिस में साथियों की बातें सिर्फ सुन रहा था। दिमाग में कार्टूनिस्ट प्राण साहब के बनाए हुए किरदार चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू, पिंकी, रॉकेट आदि चल रहे थे। नजर सामने रखे कंप्यूटर पर थी। वह कंप्यूटर, जिसके बारे में आज से करीब 20 साल पहले प्राण साहब की ही कॉमिक्सों में सुना था। प्राण साहब की उन कॉमिक्सों के बीच कहीं लिखा होता था, ‘चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है।’ उस समय नहीं पता था कि कंप्यूटर किस बला का नाम है। बच्चा बुद्धि यही सोचती थी कि शायद फर्राटे मारने वाली कोई कार होगी। आज उसी कंप्यूटर के सामने प्राण साहब के निधन की खबर पढ़कर दिल भर आया।

प्राण साहब, पिछली बार आपकी कॉमिक्स कब पढ़ी थी, यह तो याद नहीं, लेकिन इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में आपका जिक्र अक्सर हो जाता है। बचपन में जब कभी अखबार में ज्वालामुखी के फटने की खबर पढ़ते थे, तो लगता था कि साबू को गुस्सा आ गया है। बारिश के मौसम में जब साबू चाचा चौधरी को कंधे पर बिठाकर ले जाता था, तो उस समय चाचा चौधरी बादलों के ऊपर होते थे और बारिश उनके नीचे। अपने बचपन की टोली में कई बार इस बात का भी जिक्र छेड़ देते थे कि एक दिन हम भी साबू के कंधों पर बैठेंगे।

आज जब भी मंगल ग्रह या ज्यूपिटर से संबंधित कोई खबर पढ़ता हूं, तो लगता है कि वहां साबू होगा। यह जानते हुए भी कि आज बचपन की उस नादान उम्र से काफी आगे निकल आया हूं। लेकिन सोचता हूं...क्या हुआ, बचपन को याद तो किया जा सकता है।

स्कूल और घर में अक्सर लोग पढ़ाकू समझते थे। लेकिन हम कितने पढ़ाकू थे, यह बस हम ही जानते थे। स्कूल की किताबों के बीच में रखी चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी आदि की कॉमिक्सों को पढ़कर हमारा मुस्कुराना और हंसना हमारे लिए सबसे बड़ी दौलत हुआ करती थी। 50 पैसे में सुबह से लेकर शाम तक और एक रुपए में पूरे दिन के लिए आपकी कॉमिक्स किराए पर लाते थे। आपकी उन कॉमिक्सों को रखने की जगह हमारा स्कूल का बस्ता होता था। रात को उसमें कोई कॉमिक्स नहीं रखते थे। डर रहता था कि कहीं मम्मी ने देख ली, तो फिर हमारी खेर नहीं।

प्राण साहब, आपके इस दुनिया से जाने के बाद अब चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से तेज नहीं चलेगा, साबू को गुस्सा नहीं आएगा, राका फिर से जिंदा नहीं होगा। प्राण साहब, हमारे बचपन को नई खुशी देने और उसे और मनोरंजक बनाने के लिए शुक्रिया शब्द बहुत छोटा है। आप हमारे दिल में थे, दिल में हो और दिल में रहोगे।

...अलविदा प्राण साहब।

Tuesday, November 5, 2013

Sachin's retirement : It makes difference...

I don't remember exactly, when and where I heard Sachin Tendulakr's name first time. It was the time of 1996 cricket world-cup championship, when I had fallen of love cricket. That time Sachin had been playing for seven years for India. At that time I was in 8th standard. During that time, there was no TV set at my home. I used to go to watch India cricket match at a video game shop, which was little far from my home. At that time, I did't know name of Indian cricketers, excepts, Kapil Dev, but at that time he had been retired.
Within two years- in 1998- I had learnt not only all Indian player's name even ABC of this game. At that time me and cricket had become like magnetic opposite poles. We both were attracting towards each other. In this year Indian team went in Sharjah to play coca-cola cup tournament. There were three team in that tournament, India, Australia and New Zealand.
I have sweet memory of that tournament, specially for two matches of India against Australia. First match, when Indian team was fighting to assured ticket to final and second was, winning of final.
First, when Indian team was fighting : It was day-night match. It had been dark. Indian team was chasing the score which was set by Australia to win that match. India needed either win that match or became better run rate against New Zealand to reach final. Australia had already taken ticket of final. There was no electricity at that time, when Indian team was chasing the score. I went to a market (Bansal market) to watch that match. I was able to hear the irritating sound of electric generator set. There was a big ground in the market. I entered in that market. It was full of cricket fans. All shops were closed, excepts one. The shop, which was opened, there was a TV set just out of that shop. All cricket fan were watching cricket match on that TV. I had become one of them. Sachin was on the pitch. Hope was alive for Indian Team to reach the final. Sachin was hitting the ball brutally. People were hooting on every six and four of Sachin with joy. It was Sachin's storm, Indian team ensured final ticket. Sachin scored ton in that match and became player of the match.
...And Indian won the final : Just after winning that match, a big task was left for Indian cricket team. It was winning the final. Australia bat first and set the tough task for India to win that final. But it's was again Sachin's storm. Sachin scored again ton and India won the final. Sachin got not only player of the match award, even became player of the tournament.
Cover story in India Today : After few days, a cover story was published in India Today, Hindi Edition magazine (May be in English edition, but I don't know exactly). Sachin had become hero of Indian cricket team. Sachin's name was on every cricket lover's tongue. I had also become Sachin's fan. Often, I used to listen passing through the road during any Indian cricket match, 'oye, score chhod or ye bata ki Sachin ne kitne banaye? (Hello, leave the score and tell me, how much Sachin scored?).' I know, after November, 18 we will not hear this voice. Sachin has announced his retirement. I know, this day comes in every cricketer's life.
Sachin, after playing around 24 years and set uncountable milestone, nobody wants to leave you. But we know, one day you will have to leave this energetic game. We can't forget you...your game...your shot...and your passion. We will also watch cricket match after your retirement, but without you it makes difference...

Saturday, October 12, 2013

Sleepy eyes...

It was winter season. There was cold air outside my room, but it was not cool as Dilli ki Sardi. Anyhow I could open my eyes. I had set alarm in my both mobile and kept beside my pillow.
My room partner came to me and said, 'Rajesh, get up. Your both alarm are buzzing.'
I put up my both mobile and stopped the alarm. It was around 6.00 am and 10.05 am was my flight departure schedule from INDORE to DELHI. It was too early to get up for me. Actually, when you get back to your home from your office around 1.00 or 2.00 am and go to bed around 3.00 am, so it's hard nut to crack open your sleepy eyes after three hours.
After few minutes, my mobile buzzed. I picked it up and saw on the screen. It was unknown number. I received it.
'Hello.', I said.
'Sir, I have come at Atal Dwar. How far and in which direction I'll have to come for you home?', cab driver asked me.
It was cab driver's call. I called him last night to drop me at airport.
After taking direction from me, finally cab driver had reached at my home, where I lived on rent.
'Brother, you will have to wait for 30 minutes. I am getting ready', I said to cab driver standing at my balcony.
'OK', cab driver replied.
Still, I was fighting with my eyes. Without having bathed, I just washed my mouth, dressed, picked the bag and headed to the cab.
'How much?', I asked about fare to cab driver.
'200 bugs Sir', driver replied seeing me through the mirror, which was fitted near him.
I reached at airport one hour before check-in time. I was too early. After entering from the departure gate, I went to coffee shop. Still I was resisting with my sleepy eyes. Besides it, I was feeling hungry, because I could not have breakfast.
'Give me a hot coffee', I said to the boy, which was standing in the coffee shop.
'50 bugs', he said to me.
I paid him, took the coffee and went back to the chair to enjoy the coffee.
After few minutes, IndiGo employee came to me and said, 'Sir, has your boarding pass been done?'
'No.', I replied.
She asked my again about my ticket.
'Will window seat be available?', I asked to the smart lady with pink lips after showing my ticket.
'Sir, I'll have to check.', she said to me with a killing smile.
'Yes sir, window seat is available.', she said.
I took boarding pass from her. After giving me a killing smile again, she turned to another travellers.
Tum ho sath mere...sath mere ho tum yun.... the song was set as my one mobile ringtone started buzzing.
'I have rung you many times. Where are you?', I shouted at my friend after receiving my mobile.
'Sorry, I was sleeping, so I couldn't pay attention at your call.', she replied me in sleepy voice.
Actually, there was a marriage in my female friend's relative family. My female friend's relative family was not closed to me. On the invitation of my female friend, I was going there to attend the marriage. They live in Rohini in New Delhi. But I did't know where they live in Rohini exactly.
'OK, give me your relative family address', I said to my friend.
She sent me address of her relative through the message, where the marriage ceremony was going to be held. I finished my coffee and moved for security checking.
'Hello, are you going Delhi?', a person came to me and asked.
I was passed through security check and sitting in the lounge. He was unknown for me.
'Yes', I replied with fake smile.
At that time I was reading newspaper.
'OK. Are you from Delhi?', he fired one more question upon me.
Irritatingly, I replied, 'NO'
To quote my final words in the conversation, I turned my eyes towards him and replied, 'Actually, I am from KHURJA which is near to DELHI.'
Till than, he spoiled my all attention of newspaper.
'Hello, myself.... I am from Indore', he said to me.
'But, your language doesn't belongs to INDORE', I marked a question mark on his face.
'Actually, basically I am from BIHAR and I have been living in PITHAMPUR for years', he replied removing that question mark. PITHAMPUR is near to INDORE.
To keep the conversation more intact he said, 'My flight schedule was around 8.30 am, but I missed it, because I couldn't get up on the right time'.
'Oh no, it's so bad', I condoled him.
'There is my meeting schedule in GURGAON at 12.00 pm. Now it is not possible to reach there on right time.', he said again.
'Ya, I know. After reaching in Delhi at 11.30, it will not be possible to reach at GURGAON.', I replied him
'Bye-the-way, what you do?', I asked him again.
'I have my own business for which I have to travel many cities frequently.', he said proudly.
In flight, he was sitting beside me. Our conversation was going on continuously.
'Give one masala potato stick and one masala tea for me and one masala tea for him.', I said to air hostess pointed to that person who was sitting beside me.
'Sorry sir, masala potato stick is not available. Will salted potato stick do?', air hostess asked me.
'Yes, it will do.', I replied with a normal smile.
Our destination was about to come. Few minutes were left. At that time I had finished my tea and kept the box of remained potato ticks in my bag.
Finally, our flight had touched the soil of Delhi airport.
As I switched on my both mobile, I received many massages one by one. I dialled one number of them.
'Have you come in Delhi?', my friend asked me from another side.
'Yes, I have come. My flight arrived just now. I will be at you within two hours.', I said her in one breath.
'OK Mr. Bharti, this is my visiting card. Call me for maintaining our friendship.', he said to me after leaving the airport.
Now, I was not feeling sleepy, because I was in the arms of my favourite city...Delhi.
Within two hours, I had reached at my friend's relative home. She was waiting for me at the main gate of her relative colony.
After spending whole day at her relative home with few known and few unknown person, now I was feeling tired. It was late evening and weather was more cold than Indore. I asked to my friend to bring a hot blanket. I told her that I have been tired and feeling sleepy.
'You can sleep here and nobody will disturb you.', after taking me on the top floor she told me pointed out to the one room.
'Thanks dear.', I replied taking a deep breath.
Not only me, even my eyes were also in relax condition. After laying on the bed I went to deep sleep and were not feeling sleepy...

Sunday, July 7, 2013

बारिश के बीच यादों का बॉक्स

हवा के झौंके से लहराते हुए पत्तों से नजर हटने का नाम नहीं ले रही है। वह शाखा जिसपर वह कोमल कपोल लगी है, कभी नीचे तो कभी ऊपर की ओर हो रही है। आज हवा में कुछ जानी पहचानी सी खुशबू है। काले-काले बादल भी अपनी आवाज से खुद के होने का प्रमाण दे रहे हैं। प्रकृति के इस रूप को घर की बालकनी में खड़े हुए मैं बस यूं ही निहार रहा हूं। अचानक बारिश की बूंदें मेरा ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। बारिश की वो बूंदें अपने साथ एक बॉक्स को भी ले आई हैं। वह बॉक्स जिसमें मेरे अतीत से जुड़ा यादों का खजाना भरा हुआ है।

हवा के साथ बारिश की खुशबू भी मेरे अतीत की और याद दिला रही है। अतीत की यादों में मैं उस पर कब बैठ जाता हूं, पता ही नहीं चलता। मेरा वह अतीत जहां मेरी और उसकी कहानियों के चर्चे कॉलेज के कोनों-कोनों में हुआ करते थे। और मैं उन चर्चों को सुन सिर्फ मुस्कुरा देता था और उन सपनों के सच होने का इंतजार करने लगता था।

बाहर बारिश की रफ्तार तेज हो चुकी है। मिट्टी की सौंधी-सौंधी महक मुझे उसके और करीब ले जा रही है। मेरी आंखें अभी भी बंद हैं। हां, वो अब मुझे दिखाई दे रही है। ठीक उसी तरह, जैसी वो पहले थी। वो कभी नजरें मिला रही है, तो कभी नजरें चुरा रही है। उसकी वही शरारतें और अपनी सहेलियों के साथ अठखेलियां मुझे नजर आ रही हैं। बारिश यहां भी हो रही है और वहां भी। दोनों बारिशों के बीच में कोई है, तो वो सिर्फ मैं।
लग रहा है कि शायद वो मुझे बुला रही है। वही यादों के झरोखों से। मेरी आंखें अभी भी बंद हैं। बारिश वहां भी और तेज हो गई है। भीग तो वो पहले ही चुकी थी। बस बाल खोलना बाकी थे। गीला बदन उसके सौंदर्य को और निखार रहा है। पेड़ की आढ़ में छिप-छिप कर उसे देखते हुए मैं भी गीला हो गया हूं। हां, छिप-छिप कर, क्योंकि एकतरफा प्यार ऐसा ही होता है।

बर्तनों की खड़खड़ाती आवाज के बीच आंखें खोल मैं वर्तमान में आ गया हूं। यहां बारिश अभी भी हो रही है। यादों का वह बॉक्स मुझे मेरे सामने नजर आ रहा है। बूंदों की आवाज मुझे बार-बार उसके पास जाने के लिए कह रही है। आसमान को घेरे हुए बादल मुझे घूर रहे हैं। मन में एक सवाल है...। एक नहीं, कई सवाल हैं। क्या वहां भी बारिश हो रही होगी...? क्या वो भी बारिश को निहार रही होगी...? क्या उसके पास भी यादों का बॉक्स आया होगा...? क्या वो भी मेरे बारे में सोच रही होगी...? पता नहीं...।

बालकनी में बैठे-बैठे मैं भी बारिश की फुहारों से भीग सा गया हूं। वर्तमान में सिर्फ भूतकाल को महसूस करने के लिए। उसका साथ महसूस करने के लिए। बादल अपना डेरा दूसरी जगह डालने के लिए रवाना हो चुके हैं। बारिश भी उसके पीछे-पीछे चल चुकी है। मेरे यादों के बॉक्स को बारिश अपने साथ लेकर जा रही है। हालांकि बारिश ने उसमें से यादों का थोड़ा सा खजाना मेरे पास छोड़ दिया है।

बादल अभी भी मुझे घूर रहे हैं। लेकिन बारिश मुस्कुरा रही है। शनै: शनै: समय गुजर रहा है। बादल जा चुके हैं। बारिश जा चुकी है। हवा के साथ बारिश की खुशबू अभी भी मेरी सांसों में है। उसकी यादें अभी भी मेरे साथ हैं। हां यादें। क्योंकि समय गुजर जाने पर बचती हैं, तो सिर्फ यादें...।

Tuesday, September 4, 2012

‘इसे पोखा नहीं, पोहा कहते हैं’


मध्यप्रदेश और खासतौर से इंदौर की बात हो और उसमें पोहा-जलेबी शामिल न हो, ऐसा नहीं हो सकता। यदि आप विदेश या अपने राज्य से बाहर जाते हैं, तो आपको अपने शहर के खाने की कमी बहुत महसूस होती है। आखिर जीभ चटोरी जो ठहरी। सितंबर 2009 की बात है। पहली बार जॉब के लिए मध्यप्रदेश आना हुआ। भोपाल स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर सुबहकरीब 7 बजे ट्रेन राजा भोज की नगरी में आ चुकी थी। हम तीन लोग थे।एक मैं और दो मेरे दोस्त, जो दिल्ली से ही मेरे साथ आए थे। स्टेशन से बाहर निकलकर ऑटो पकड़ा और हम चूना भट्टी स्थित कंपनी के गेस्ट हाउस पहुंच गए। अगले दिन ऑफिस का पहला दिन था। मेरे साथ दिल्ली से आए दोस्तों के साथ मैं ऑफिस पहुंचा। रास्ते में कई जगह रेस्टोरेंट्स, ठेलों और चाय आदि की दुकान पर पिचके हुए पीले चावल जैसी चीज को लोगों द्वारा बड़े चाव से खाते देखा। मन में विचार आया। आखिर ये पीली-पीली चीज क्या है? इससे पहले मैंने कभी उसे खाना तो दूर, देखातक नहीं था।
खैर, ऑफिस आया। दोपहर के समय ऑफिस से बाहर घूमने निकला। चूँकि वह मेरा ऑफिस का पहला दिन था, आसपास की चीजों को देखने की उत्सुकता हुई। अभी तक भोपाल या ऑफिस के किसी भी व्यक्ति से मेरी दोस्ती नहीं हो पाई थी। मैं अपने दिल्ली वाले दोस्तों के साथ ऑफिस के बाहर स्थित छोले-भटूरे, छोले-कुलचे, आलू नान आदि बेचने वालों को तलाश कर रहा था। लेकिन मुझे वहां स्थित लगभग हर शॉप पर वही पीले-पीले पिचके हुए चावल दिखाई दे रहे थे। हम लोग कुछ देर घूमने के बाद वापस ऑफिस आ गए और वहां की कैंटीन में बैठकर पेट में कूद रहे चूहों को शांत किया।
भोपाल में एक दिन गुजरने के बाद भी हम इस पीली-पीली चीज के नाम का रहस्य नहीं सुलझा पाए थे। मैं तो क्या, मेरे दोस्त भी इस उलझन में थे की इसका नाम क्या है। अगले दिन मेरी थोड़ी सी दोस्ती ऑफिस में ही काम करने वाले एक व्यक्ति से हो गई। मैंने बातों-बातों में उस व्यक्ति से पूछ लिया कि इस पीली-पीली चीज का नाम क्या है? उसने इसका सही नाम बताया था, लेकिन मेरी समझ में आया ‘पोखा’। कुछ देर के लिए में चक्कर में पड़ गया कि कैसा नाम है इसका! मैंने अपने साथी दोस्तों को बताया कि जिस पीली-पीली चीज को हम कई दिनों से देख रहे हैं, उसका नाम पोखा है।
नया प्रदेश, नया शहर और खाने की कोई नई चीज। मन में इच्छा हुई कि चलो, पोखा खाकर देखते हैं। शाम का समय था। मैं अपने एक दोस्त के साथ ऑफिस से बाहर निकलकर आया। ऑफिस के सामने स्थित एक ठेले पर हम उस पीली-पीली चीज को खाने के लिए पहुंच गए। मैंने वहां पहुंचते ही ठेले वाले से कहा, ‘भाई ये पोखा खिलाना।’ पोखा नाम सुनते ही उसके माथे पर एक शिकन सी आ गई थी। मैंने ध्यान नहीं दिया। करीब दो मिनट बाद मैंने उससे फिर कहा, ‘भाई, पोखा देने में कितना समय लगेगा?’ मेरे इतना कहते ही ठेले वाले ने मुझसे पूछा, ‘क्या आप किसी अन्य शहर से हैं?’ ‘हां’, मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा। यह सुनकर ठेले वाले के चेहरे पर मुस्कान आ गई। मेरी कुछ समझ में नहीं आया। उसने एक प्लेट निकली और उसमें वही पीले-पीले पिचके हुए चावल डाले और उसमें प्याज, हरी मिर्च, कई तरह की नमकीन आदि मिलाते हुए हमें दिए। जब वह हमें प्लेट दे रहा था। उसने अपना हाथ कुछ देर के लिए रोका और बोला, ‘भाईसाहब, इसे पोखा नहीं पोहा कहते हैं।’ आज इंदौर में करीब दो-ढाई साल बिताने के बाद वही पोखा...सॉरी...पोहा मेरी फेवरेट डिशेज में से एक हो गया है।

Sunday, February 13, 2011

एक पत्र मेरी प्रेमिका के नाम

प्रियतमे,
जानता हूं, तुम कुछ नाराज़ हो। और तुम्हारी नाराज़गी भी जायज़ है। आखिर मैंने तुम्हें अभी तक कोई पत्र जो नहीं लिखा। हां, इतना है कि ख्वाबों के पन्नों पर दिल की स्याही से कुछ शब्द ज़रूर लिखे हैं। वे शब्द जो अनदिखे हैं। वे शब्द जो कभी जुबां से बयां नहीं हुए। वे शब्द जो अपने सच होने का इंतजार कर रहे हैं। जानता हूं, तुम मुझसे दूर हो। लेकिन मुझे इसका गम नहीं है। तुम्हारी यादें हर वक्त मेरे साथ रहती हैं। ख्वाबों के इस फ्रेम में तुम्हारी तस्वीर हर समय मेरे साथ रहती है। मेरी सुबह में आज भी तुम्हारे बदन की महक महसूस होती है। जानती हो...मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या सपने सजाए हैं??? वो आसमान की सैर...वो समुद्र का किनारा...और ठंडी-ठंडी हवाओं के बीच सिर्फ मैं और तुम।

कंधे पर टांगने वाला तुम्हारा वो बटुआ, जिसे तुमने कुछ दिनों पहले ख़रीदा था, बहुत सुन्दर है। तुम सोच रही होगी कि मुझे कैसे पता चला? भूल गईं, तुमने मेरे सपने में आकर जो इसे दिखाया था। बटुए का कत्थई रंग तुम्हारे वस्त्रों से मेल खा रहा था। सच कहूं, इस प्रेम-पर्व पर मुझे तुम्हारी काफी याद आ रही है। काश तुम तेरे पास होतीं...काश तुम मेरे साथ होतीं...काश तुम एक हकीकत होतीं। क्या बात है...तुमने अब सपनों में आना कम कर दिया है? क्यों इतनी नाराज़ हो गई हो? तुम्हें याद है बारिश की वो सुबह...जब तुम्हारे भीगे बदन से लिपटी हुई चुनरी पेड़ की शाखा में अटक गई थी। तब तुम कितनी नाराज़ हुईं थीं। तुम्हारे माथे की वो शिकन मुझे आज भी याद है।

इस प्रेम-पर्व पर तुम्हें देने के लिए मैंने खास उपहार खरीदा है। जब तुम मिलोगी, तब दिखाऊंगा। उम्मीद है कि तुम्हें यह उपहार पसंद आएगा। जब तुम सोकर उठती हो, तो क्या अभी भी तुम्हारी जुल्फें सीने से लिपटी हुई होती हैं? कितनी खुशनसीब हैं ना...तुम्हारी जुल्फें। हां...तुम्हारी जुल्फें। बहुत शरारती हैं। जब तुम चलती हो तो तुम्हारे चेहरे पर आकर अठखेलियां करती हैं। जब तुम खड़ी होती हो तो गर्दन पर लिपट जाती हैं। जब तुम नहाती हो तो बदन से चिपक जाती हैं। तुम्हारी आंखों का काजल आज भी तुम्हारे सौंदर्य में चार-चांद लगाता होगा। तुम्हारा वह सौंदर्य जो कुदरत की देन है।

क्या तुम्हें पता, जब कुछ तितलियों ने तुम्हें चारों ओर से घेर लिया था। ऐसी ही एक तितली आज मेरे पास आई। मुझे कुछ दूरी पर बैठी हुई थी। गुमसुम। ना जाने उसे क्या हुआ था...मैं उससे कुछ पूछना चाहता था...कुछ कहना चाहत था...और हां, तुम्हारे पास एक सन्देश भिजवाना चाहता था। जब मैं उसके पास गया वह उड़ गई। लगता है तुम अब मुस्कुरा रही होगी। मेरे भी चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गई है। तुम भी सोच रही होगी कि मैं भी ना जाने इस पत्र में क्या-क्या लिख रहा हूं। बुद्धू, पागल और ना जाने किस-किस नाम से तुम मेरा नाम ले रही होगी। हां...बुद्धू हूं मैं....तुम्हारा बुद्धू... तुम्हारे लिए बुद्धू। मुझे उम्मीद है कि अब तुम्हारी नाराज़गी दूर हो गई होगी। और हां...कोशिश करूंगा कि मैं तुम्हारे लिए पत्र लिखता रहूं। अंत में तुम्हारे लिए एक खास सन्देश, 'मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। इस प्रेम-पर्व की तुम्हें बहुत-बहुत बधाई।'

तुम्हारा...सिर्फ तुम्हारा...
बुद्धू

Tuesday, February 8, 2011

मोहे भी रंग दियो बासंती रंग ने

आज मेरा मन चंचल है। इधर-उधर घूम रही हूं। कभी पेड़ों से टकराती तो कभी फूलों को छूकर निकल जाती। आप लोगों को भी मैं खुद के शरारती होने का अहसास कर रही हूं। क्या करूं...आज मेरा मन चंचल जो है। इस बासंती रंग ने अपने रंग में मुझे भी रंग दिया है। मेरे अन्दर भी प्रेम-भाव की भावना उमंग ले रही है। आज मेरा खुद पर बस नहीं है। ऐसा है इस बसंत का रंग। मैं हवा हूं। कोई राह नहीं। बस चले जा रही हूं। रमे जा रही हूं। इस बासंती रंग में।

पेड़ों पर बौर इस दुनिया में आ चुके हैं। शाखाओं से चिपके हुए। इन्हें इंतजार है खुद के जवान होने का। मैं इन्हें झूला झुला रही हूं। आज प्रकृति भी नए वस्त्रों से सजी हुई है। नई दुल्हन की तरह दिखाई दे रही है। बासंती रंग का खुमार प्रकृति पर भी चढ़ा हुआ है। बच्चे भी खुश दिखाई दे रहे हैं। खेल रहे हैं। कूद रहे है। पतंग उड़ा रहे हैं। मैं इनके कानों में मधुर स्वर घोल रही हूं। ये मेरे होने का अहसास कर रहे हैं। मैं देख रही हूं कि भौंरे फूलों को छेड़ रहे हैं। इनमें भी प्यार की लहरे हिलोरें ले रही हैं। मैं देख रही हूं कि गेहूं की फसल पर सोने की परत ने चढ़ना शुरू कर दिया है। किसान के चेहरे पर हंसी और जानवरों की मस्ती पर भी बासंती रंग चढ़ गया है।

इन सबके बावजूद मुझे कुछ दुःख है। मुझे दुःख है इस बात का कि पूरी मानव प्रजाति खुश नहीं है। इस बसंत ऋतु में काफी लोगों के चेहरे पर मुझे ख़ुशी दिखाई नहीं दे रही है। ये लोग प्रेम-भाव से दूर हैं। मैं देख रही हूं कि कुछ लोग आपस में लड़ रहे हैं। एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं। ना जाने क्यों...??? वह प्यार जो कभी एक-दूसरे पर उमड़ता था, कहीं खो गया है। कहीं खो गई हैं वो नज़रें जिनसे कभी मानव एक-दूसरे को देखा करता था। वो नज़रें जिनमें खुशियों भरी चमक होती थी। खो गई हैं गावों की वो चौपालें जिन पर कभी लोगों की हंसी सुनाई देती थी। हुक्कों की गडगडाहट सुनाई देती थी। अब तो गावों की चौपाल से चारपाई भी गायब होने लगी है।

इस प्यार भरे मौसम में मुझे लोगों के बीच प्यार कम या ये कहूं कि दिखाई ही नहीं दे रहा है। और मैं हूं कि इस बासंती रंग में पागल हो रही हूं। लोग इस मौसम का सिर्फ मजा ले रहे हैं। समझ नहीं रहे। वे नहीं समझ रहे कि हम एक-दूसरे की बीच की दूरियों को मिटा दें। हम मिटा दें वो फासले जिन्होंने एक दीवार का रूप ले लिया है। वे दीवारें जिन्होंने लोगों के बीच प्यार को कम कर दिया है। वह प्यार जो हमारे देश की एकता और अखंडता को एक डोर में बांधे रखता है। मुझे दुःख होता है यह देखकर कि आज मानव मानवता को भूलता जा रहा है।

मुझे एक कटती हुई पतंग दिखाई दे रही है। इधर-उधर उड़ रही है। मुझे इसे सहारा देने की ज़रुरत है। आखिर यह कटी पतंग कब तक मेरी बाहों में रहेगी। कटने के बाद इसे आना तो ज़मीन पर ही होगा। काश! यह कटी न होती...काश! यह डोर से बंधी हुई होती...इसी कटी पतंग की तरह एक दिन मानव भी ज़मीन पर आ गिरेगा। यदि इसे बुलंद रहना है तो प्यार के डोर में बंधे रहने होगा। मेरा क्या है...मैं आज इधर तो कल उधर...बासंती मौसम भी कुछ समय बाद चला जाएगा। यह चला जाएगा एक संदेश देकर। वह संदेश को प्यार भरा है...उमंग भरा है...शरारत भरा है...

Thursday, February 3, 2011

दीवार पर हवाई जहाज आज भी बनता है

याद करो बचपन का वो ज़माना, जब सर्दियों में रात को बिस्तर पर लेटे हुए छत और दीवारों पर नज़र पड़ती थी। कमरे की वो दीवारें जिन पर अजीब सी आकृतियां नज़र आती थीं। कभी हाथी, कभी घोड़ा, कभी अपने देश का नक्शा तो कभी उड़ता हुआ हवाई जहाज। हां...हवाई जहाज। और ऐसी ना जाने कितनी आकृतियां हमें कमरे की उन दीवारों पर नज़र आती थीं। वह दीवारें जिनसे पुताई की पपड़ियां छूट रही होती थीं। वह दीवारें जिन पर बारिश के पानी की सीलन आती थी। मेरे घर के वो कमरे आज भी वही हैं। कुछ कमरे और बन गए हैं। बारिश के बाद दीवार पर सीलन आज भी रहती है। पपड़ी आज भी छुटती है। और...हां...हवाई जहाज आज भी बनता है।

समय अपने बदलने का अहसास करा चुका है। समय के साथ हवाई जहाज की भी स्पीड बढ़ चुकी है। वह हवाई जहाज मेरे घर से करीब एक हजार किलोमीटर की दूरी तय कर अब इंदौर में आ गया है। यहां मेरे कमरे की दीवारों पर ना तो सीलन है और ना ही उनसे छुटती पपड़ी। लेकिन वो हवाई जहाज...हां वही... मेरे घर वाला, आज भी कभी-कभी दीवारों पर नज़र आ जाता है। अब यह कुछ शोर करने लगा है। वापस उसी दीवार पर जाना चाहता है। वह दीवार जो मेरे घर पर है। वह दीवार जो इसका एअरपोर्ट है। और मेरी नज़रें इसका ईंधन। अब इसे कौन समझाए कि समय बहुत आगे निकल चुका है। हां, इतना आगे कि इस जहाज को वापस एअरपोर्ट पर पहुंचना नामुमकिन है।

हवाई जहाज के साथ में दीवारों पर हाथी-घोड़े को भी तलाश करता हूं। ये अब दिखाई नहीं देते। लगता है इन्होंने साथ छोड़ दिया है। और हो भी क्यों ना...आखिर जिंदगी में साथ होता ही किसका है। और यदि हो भी तो कितने दिन का???? हां इतना ज़रूर है कि यह हवाई जहाज मुझे मेरे घर की याद दिलाता है। अपने एअरपोर्ट की याद दिलाता है। और याद दिलाता है मेरा वो अतीत जिसे मैंने बहुत पीछे छोड़ दिया है। समय अपनी रफ़्तार को और अधिक बढ़ा चुका है। मैं इस हवाई जहाज से आगे निकलना चाहता हूं। इतना आगे कि इसकी परछाईं भी मुझे दिखाई ना दे। मैं अपने अतीत में ना पहुंच पाऊं। जैसे मुझे हाथी और घोड़ों ने छोड़ दिया ऐसे ही मैं अब इसे छोड़ना चाहता हूंमुझे अब मेरे सपनों के हवाई जहाज की ज़रुरत है। वह हवाई जहाज जिस पर मेरे सपनों के पंख लगे हुए हैं। मेरे वह सपने जो मेरा भविष्य हैं। वह भविष्य जो मेरा है

काफी रात हो चुकी है
। नींद मुझे अपने आगोश में ले रही है। कमरे की जलती हुई लाइट मुझे परेशान कर रही है। मच्छरों ने भी अपना म्यूजिक शुरू कर दिया है। ऐसे म्यूजिक जिसे मैं तो क्या आप भी सुनना पसंद नहीं करेंगेलेकिन सामने की दीवार पर वह हवाई जहाज मुझे अभी भी दिखाई दे रहा है। शोर करता हुआ। इन सबका एक ही समाधान है कि मैं नींद के आगोश में चला जाऊं। अगली सुबह एक नए जोश, नई उम्मीद और अपने सपने की ओर कदम बढ़ाने के लिए। मैं अब इस हवाई जहाज को आज की रात के लिए दूर कर रहा हूंहां...आज की रात के लिए, क्योंकि पता नहीं ये शायद कल रात फिर मेरे कमरे की दीवार पर फिर आ जाए

Monday, January 31, 2011

दिल करता है आज फिर 'बच्चा' बन जाऊं

आजकल दिल में एक अजीब सी बैचेनी होती है। रह-रह कर बचपन का समय याद आता है। सुबह उठते ही पड़ोस में रहने वाले मुनीम जी के घर पर दस्तक देता था। और नानी के गांव में एक प्राइमरी स्कूल में करीब दो महीने की पढ़ाई। गांव में लहलहाते खेत और अपने शहर में रात को आसमान में उड़ते हवाई जहाजों की लाइट देख शोर मचाना। इन बातों को याद कर दिल कह उठता है कि मैं आज फिर बच्चा बन जाऊं। लौट जाए यह समय। पहुंचा दे उस दुनिया में जहां कोई फ़िक्र नहीं थी। गांव के उस स्कूल से छुट्टी के समय घर तक की करीब 20 मिनट की दूरी एक घंटे में पूरी करना। रास्ते में पड़ने वाले बाग़ के पेड़ों से फल तोड़ना। जब बाग़ का माली हमें देखता तो उसे देख वहां से या तो रफूचक्कर हो जाना या किसी पेड़ की आड़ में छिप जाना।

मुझे याद हैं बारिश के वो दिन, जब मेरी गली में कुछ पानी भर जाता था। उस पानी में कागज़ की कश्ती का हिचकोले लेना। नानी के यहां दूध की हांडी से चुपके-चुपके मलाई खाना। लेकिन पकड़े जाने पर डांट भी खूब पड़ती थी। 25 या 50 पैसे में पूरे दिन दुकान से चीज लेकर खाना। कभी-कभी जब एक रुपया मिल जाता, तो हमसे बड़ा शहंशाह कोई नहीं। मुझे याद है तौलिए में मक्के की रोटी के साथ चावल की खिचड़ी बांधकर खेत पर ले जाना। सावन के महीने में पेड़ों पर रस्सी डालकर झूला झूलना। मन करता था कि पेंग बढ़ाकर नभ को छू लूं। पर आसमान भी शरारती। खुद को और ऊंचा कर लेता।

मुझे आज बचपन का वह जमाना याद आता है। शहर में मेरे घर की गली अभी भी वही है। बारिश भी होती है, लेकिन पानी नहीं भरता। मेरे साथ गली भी जवान हो गई है। जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही बचपन को छोड़ दिया। नहीं छूटीं तो यादें। हां...यादें। वो यादें जो आज भी मेरे ज़हन में रहती हैं।

रात को ऑफिस से आने के बाद नींद जल्दी नहीं आती। लेकिन बचपन में शाम होते ही नींद अपने आगोश में ले लेती थी। पेड़ों पर चिड़ियाओं ने भी चहचहाना कम कर दिया है। या यह कहूं कि बंद कर दिया है। गांव के वो खेत आज भी वही हैं। बदला है तो सिर्फ खेत का कुआं। वह कुआं जिसमें दोस्तों के साथ मिट्टी के कंकड़ों से निशाना लगाते थे।

मुझे याद है मेरी गली में वो बाइस्कोप और खिलौने वाले का आना। 25 या 50 या एक रोटी में बाइस्कोप दिखाता था। गाने की फरमाइश अमिताभ या मिथुन की फिल्म की होती थी। बदलते समय से साथ वह बाइस्कोप वाला भी कहीं खो गया है। बचा है तो सिर्फ उसका नाम। गर्मियों की रात में गली के बच्चों के साथ खेलना। जब लाइट चली जाती थी तो आइस-पाइस (हाइड एंड सीक) खेलने का मजा दोगुना हो जाता था।

आज की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में वो बचपन मीलों पीछे छूट गया है। सामने कुछ जिम्मेदारियां बाहें फैलाए खड़ी हैं। आखिर बचपन का साथ होता ही कितना है। यही आठ-दस साल। इसके बाद तो सिर्फ उसकी यादों का साथ होता है। वह यादें जिन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता। वह यादें जिनका उदाहरण जवानी में आकर बच्चों को दिया जाता है। आज जब कभी दोस्तों के साथ महफ़िल में उन यादों को याद करता हूं तो दिल उठता है, 'आज मैं फिर से बच्चा बन जाऊं...फिर से बच्चा बन जाऊं।'

Saturday, December 11, 2010

अनकही नज़रें

या तो वह उदास थी, या उसे कोई परेशान कर रहा था। उसके माथे की शिकन मुझे इस बात का आभास करा रही थी कि वो बैचेन है। कभी अपने हाथ की उंगलियों को मरोड़ती तो कभी अपनी नज़रों से इधर-उधर देखती। अपनी नज़रें चुराकर मैंने कई बार उसकी ओर देखा। कई बार उससे नज़रें मिलीं। वह मुझे गुस्से में दिखी। कुछ देर बाद मेरे पास आई और मुझे छूकर बहुत तेजी से निकल गई। मैं उसे पकड़ पता उससे पहले ही उसकी मां वहां आ गई थी।

'तुम यहां क्या कर रही हो?' उसकी मां ने डांट लगाते हुए उससे कहा। वह सिर्फ मुस्कुराई। कुछ नहीं बोली और अपनी मां के आंचल से लिपट गई। मैं टकटकी लगाए यह सब देख रहा था। न जाने क्या हुआ था उसे। उसने मेरी ओर एक नज़र देखा और अजीब सा मुंह बनाया। हाथों से कुछ इशारा भी किया, लेकिन मैं समझ नहीं पाया।

'भाईसाहब आपकी चाय', चाय वाले ने चाय का गिलास मेरी ओर करते हुए कहा। मैंने चाय की एक चुस्की ली। वो अभी भी मेरी ओर देख रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कि मानों वो मुझसे कुछ कहना चाहती हो।
'भाईसाहब, लगता है आपको बाज़ार से शकर सस्ती मिलती है?', मैंने उसकी ओर से अपनी नज़रें हटाते हुए चाय वाले से कहा।
'नहीं साहब, ऐसा नहीं है। क्या हुआ। तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो?', चाय वाले ने मुझसे पूछा।
'आपकी चाय इतनी मीठी जो है,' मैंने उसे हंसते हुए जवाब दिया।

वह अभी भी अपनी मां के साथ थी। मेरी चाय भी ख़त्म होने वाली थी। तभी उसकी मां उसे लेकर मेरे पास आई और बोली,'बाबूजी...'
उस लड़की की नज़रें अब बड़ी मासूमियत से मेरी ओर देख रही थीं। मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और उसे दे दिए। मैं वापस अपने कमरे पर आ चुका था। रास्ते में सोचता रहा कि वह चार-पांच साल की लड़की जिसके बाल बिखरे हुए और तन कर नाममात्र कपड़े, अपनी मां से कितना प्यार करती है। यह जानते हुए भी कि उसका जीवन दूसरों पर निर्भर है। इतना प्यार हम दूसरों से करें, तो अपने साथ दूसरों का भी जीवन बदल सकते हैं।

Thursday, November 25, 2010

This is Today

Is this Today? Often I ask this stupid question to myself. I don't remember, but when I was child there was a photo frame at my home. I used to ask my father,'Papa, what is written in this frame?' My father said, 'When you will grow then read it.' Actually it was written in English language and that time I didn't know anything about English.

There were written some lines about Today on white paper in that frame. The heading was 'This is Today.' Now, where is that frame nobody know from my family members. Today, I find that frame, but that is not. It has been misplaced.

Few days ago, after returning at my home in Indore from office at 2am, I was laying on the bed. Not feeling sleepy. I went on my past memories at childhood. Stucked at frame scene. I compared heading of those lines with my Today. Today I am getting 'This is Today.' We understand the value of today, when we lost it. I have lost my many todays, but don't want to lose it again. I am not loser. I accept, I have lost many things waiting for today. It is said,'To get something we have to lose something.' But there are few things remain I have not achieved so far.

Many people say to me,'Rajesh, today you are lucky. You are living enjoyable life. You have good job, good salary according job. you are tension free.' But tension free...??? No, besides job I have few tension. When I phone at my home, my mother says,'Beta (son), live without tension.' I know, I don't need any kind of tension. But when you live out of your home then some concerns are inevitable.

Today I think, I am tension free, No tension for spending money, no tension for getting up early in the morning and so on...Today I think, where am I? Is this final end of my future? No, no, no...this is not final end of my future. I want to move ahead. I want to do different in my life. My struggle for my future has not finished. My dreams have not fulfilled. Today is partially for me. This partially today is not mine. My today is waiting for me. It is calling me. I am moving towards them. It is saying, 'I am today.' I am smiling and looking it. I am saying, 'Wait, I am coming.' Yes, wait. I know tomorrow never waits, but today waits for better tomorrow.

Saturday, October 2, 2010

आस्था के न्याय पर न हो राजनीति

छः दशक के लम्बे इंतजार के बाद अयोद्धया मसले पर आया फैसला सुकून देने वाला है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा दिए गए फैसले से लगभग सभी राजनैतिक दल संतुष्ट नज़र आए। लेकिन फैसले के दो दिन बाद ही समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपनी जुबान खोल बैठे। वह भी ऐसे समय जब फैसले पर दो मुख्य पार्टियां भाजपा और कांग्रेस फैसले से खुश नज़र आ रही हैं। 1990 में अपनी रथ यात्रा से हिन्दुओं में राम भक्ति का अलख जगाने वाले भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी भी अब फैसला आने के बाद उसकी तारीफ करते नहीं थक रहे। यही नहीं फैसले के बाद किसी भी प्रकार की अनहोनी की जो आशंका लगाई जा रही थी वह भी गलत साबित हुई। इससे पता चलता है कि देश की जनता अब अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति काफी सजग हो गई है। वह समझ गई है कि कोई भी सज्जन व्यक्ति चाहें वह किसी भी धर्म का हो उसे आज अपने कामों से फुरसत नहीं है। हां, इतना ज़रूर है कि असामाजिक तत्व ज़रूर शांति में खलल डालने की कोशिश कर सकते हैं।

अब से करीब 18 साल पहले 1992 को बाबरी मस्जिद ढहने के बाद जो हिंसा हुई थी, उसकी चिंगारी राजनीति से ही प्रेरित थी और उसके बाद पूरे देश में इस चिंगारी ने आग का रूप धारण कर लिया था। उस समय मैं बहुत ही छोटा था, लेकिन उस आग में देश किस प्रकार जल रहा था यह मुझे अच्छी तरह याद है। मेरे पापा भी पत्रकार हैं और उस समय कर्फ्यू के दौरान उन्हें रिपोर्टिंग के लिए कर्फ्यू पास मिला हुआ था। उस समय पापा की रिपोर्टिंग की फाइल आज भी मौजूद है। एक बार वो फाइल मेरे हाथ लग गई थी। पापा की वो ख़बरें जो अखबार में छपी थीं, उन्हें पढ़कर एक भयावह द्रश्य मेरी आंखों के सामने आ गया था। जब कोर्ट का फैसला आया तो मैं भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि 1992 फिर से न दोहराया जाए। आख़िरकार फैसला आने के बाद सब कुछ सही सलामत निपट गया। हां, इतना ज़रूर है कि विवादित ज़मीन को तीन हिस्सों में बांटने के फैसले से कुछ लोग ज़रूर नाराज़ हैं, लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि उनमें बदले की भावना कहीं दिखाई नहीं दे रही। वैसे भी जो पक्ष इस फैसले से खुश नहीं हैं उनके पास सुप्रीम कोर्ट में जाने का रास्ता खुला हुआ है।

मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मुलायम सिंह को इस फैसले से क्यों निराशा हुई है? आखिर मुलायम सिंह ने क्यों कहा कि फैसले से मुसलमान खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं? जब कि किसी भी मुसलिम दल ने इस प्रकार की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिर मुलायम सिंह को क्यों ऐसा लगा कि न्यायपालिका ने यह फैसला आस्था को कानून और सबूतों को ऊपर रखकर दिया है? मुलायम सिंह को ऐसा क्यों लग रहा है कि इस फैसले के बाद आगे चलकर अनेक संकट पैदा होंगे? मुलायम सिंह मुसलमानों के प्रति इतने मुलायम कब से हो गए कि उन्होंने कह दिया कि फैसले से पूरे मुसलिम समुदाय में मायूसी है?

पिछले वर्ष मई में मुलायम सिंह के सहयोगी रहे आज़म खान को खुद मुलायम ने पार्टी से छः साल के लिए निकाल दिया। इस पर मुलायम सिंह का तर्क था कि आज़म पार्टी विरोधी काम कर रहे थे। आज़म को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा उन्होंने भाजपा के पूर्व नेता कल्याण सिंह को अपनी पार्टी में शामिल करने का मन बना लिया। पार्टी के सम्मेलनों में मुलायम सिंह कल्याण सिंह को अपने साथ ले जाने लगे। क्या मुलायम सिंह यहां यह भूल गए थे कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे और तब से लेकर अब तक वे मुस्लिमों के निशाने पर हैं। जहां एक तरफ मुलायम सिंह आज़म खान को बाहर कर काफी मुस्लिमों के बुरे बन गए थे, वहीं कल्याण से दोस्ती ने आग में घी का काम कर दिया। मुलायम सिंह के इस रवैये से मुसलिम इतने खफा हुए कि उन्होंने धीरे-धीरे पार्टी से किनारा करना शुरू कर दिया। आखिरकार सपा प्रमुख को अपनी गलती का अहसास हुआ और कल्याण से कन्नी काट ली।

पिछली इन बातों को ध्यान में रख हो सकता है कि वो मुस्लिमों के हितैषी बनने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन उनकी भाषा बदली हुई है। मुलायम सिंह की फैसले पर प्रतिक्रिया के बाद उनकी निंदा मुस्लिमों ने भी ज़ोरदार तरीके से की है। ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य और ईदगाह के नायब इमाम मौलाना रशीद फिरंगी महली ने मुलायम सिंह की प्रतिक्रिया के बाद कहा कि पूरे देश में दोनों समुदाय के के धार्मिक नेताओं, राजनेताओं और मीडिया ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी ज़िम्मेदारी और संयम का परिचय दिया है। किसी को भी ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए जो राजनीति से प्रेरित लगती हो और जिससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका हो। वहीं शिया मुसलिम पर्सनल ला बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद मिर्ज़ा अतहर ने मुलायम सिंह के बयान पर आश्चर्य जताया।

मुसलिम-यादव (माई) का फ़ॉर्मूला आजमाने वाले मुलायम सिंह को ऐसे बयान राजनीति में शोभा नहीं देते। मुसलिम समुदाय की ओर से आए इन बयानों के बाद अब मुलायम सिंह को समझ में आ जाना चाहिए कि आज का भारत अब काफी बदल चुका है। साथ ही राजनेताओं को भी फैसले पर अब ऐसी किसी भी प्रकार की टिप्पणी से बचना चाहिए जिससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका हो।

Wednesday, September 15, 2010

कितनी स्थाई होगी झारखंड में आठवीं सरकार

बिहार से 2000 में झारखण्ड के अलग होने के बाद इस बात की उम्मीद लगाई जा रही थी कि विकास से महरूम रहे इस क्षेत्र का शायद अब सही ढंग से विकास हो पाएगा। लेकिन 10 साल में आठ सरकार बनने के बाद भी यहां की जनता को विकास के लिए इंतजार करना पड़ रहा है। अर्जुन मुंडा के रूप में झारखण्ड की जनता को मिली आठवीं सरकार कितनी स्थाई होकर यहां का विकास करेगी, इस बात को कहना मुश्किल है। झारखण्ड में पिछले दस साल का इतिहास गवाह रहा है कि राज्य का जो भी मुख्यमंत्री बना है उसने सिर्फ इसे लूटा है। या ये कहें कि विकास के नाम पर राजनीति की है।

81 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में पिछले वर्ष दिसंबर में चुनाव हुए। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार किसी एक पार्टी की सरकार बनेगी। लेकिन जब परिणाम आए तो किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इससे साफ़ हो गया कि इस बार भी गठबंधन वाली सरकार ही होगी। वह सरकार जिसकी बुनियाद कमजोर होगी। इस चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ताकत के रूप में उभरा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जेएमएम की ताकत आदिवासी और पिछड़े खासकर महतो समुदाय के लोग हैं। जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन आदिवासी नेता हैं और इनके लिए लगातार आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं। साथ ही इस चुनाव में जेएमएम किंगमेकर के रूप में सामने आई थी। इससे सोरेन का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय था। और हुआ भी यही। 30 दिसंबर को सोरेन राज्य के सातवें मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री के रूप में गुरूजी का यह तीसरा कार्यकाल था। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए के सहयोग से बनी यह सरकार भी लगभग चार महीने बाद ही उस समय अल्पत में आ गई जब भाजपा ने उससे समर्थन वापसी का ऐलान कर दिया। इसका कारण सोरेन खुद बने, क्योंकि उन्होंने भाजपा द्वारा लाए गए बजट कटौती प्रस्ताव के खिलाफ मतदान कर दिया था। यह मतदान सीधे यूपीए सरकार के पक्ष में था। हालांकि दिल्ली से रांची जाते समय इसके लिए सोरेन ने माफ़ी भी मांगी, लेकिन तब-तक देर हो चुकी थी। भाजपा की संसदीय समिति ने सोरेन के इस कदम को गठबंधन धर्म के खिलाफ बताया।

काफी जद्दोज़हद के बाद भी सोरेन भाजपा को मनाने में असफल रहे और अंततः ३० मई को उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। इसके ठीक दो दिन बाद एक जून को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इससे पहले भी यहां करीब एक साल राष्ट्रपति शासन रहा है। करीब तीन महीने राष्ट्रपति शासन रहने के बाद सात दिसंबर को भाजपा ने जेएमएम के साथ मिलकर सरकार बनाने की दावेदारी पेश कर दी। इस बार जेएमएम ने भाजपा को बिना किसी शर्त के समर्थन देने की बात की। आख़िरकार ११ सितंबर को अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में एक और नई सरकार का गठन हो गया। लेकिन जिन राजनीतिक समीकरणों से इस सरकार का गठन हुआ है उन्हें देखते हुए इस सरकार के भविष्य पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। इसका भी मुख्य कारण भाजपा और जेएमएम हैं, क्योंकि दोनों पार्टियों को स्वाभाविक सहयोगी नहीं कहा जा सकता।

नाजुक गठबंधन के बहुमत पर टिकी सरकारों से देश और राज्य अच्छी तरह परिचित हैं। ऐसी सरकारें अस्थिरता के झूले में झूलती नज़र आती हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण झारखण्ड ही है जहां कोई भी सरकार राज्य से दस सालों के इतिहास में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने मुंडा ने बेशक कहा हो कि उनकी यह सरकार स्थिर रहेगी और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगी। लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए मुंडा के दावों पर यकीन करना कठिन है।

लौह अयस्क, तांबा अयस्क, कोयला, अभ्रक आदि प्राकृतिक संसाधनों वाले इस राज्य में जो भी सरकारें बनी हैं उन्होंने यहां की जनता को अधिकतर निराश ही किया है। यही नहीं राजनीतिक उठापठक के चलते पिछले कुछ सालों में झारखण्ड में प्रशासन व्यवस्था भी ख़राब हुई है। साथ ही इस राज्य में नक्सल एक बड़ी समस्या है। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के चार हज़ार करोड़ रुपए के स्पेक्ट्रम घोटाले से प्रदेश की छवि ख़राब हुई है। यही नहीं स्थाई सरकार के अभाव में झारखण्ड की विकास दर भी गिरी है, जिससे यह राज्य और ज्यादा पिछड़ गया है। इस समय मुंडा के सामने झारखण्ड को इन हालातों से निकालकर विकास की और ले जाना एक बड़ी चुनौती है। यही नहीं मुंडा की सरकार से यहां के लोगों को काफी अपेक्षाएं हैं। साथ ही मुंडा के लिए यह समय अवसर भुनाने का है। अब देखना यह है कि मुंडा की यह सरकार कितने दिन टिकती है और यहां के विकास के लिए क्या कम करती है।

Thursday, August 12, 2010

'बाबू जी, किताब ले लो'

कुछ दिनों पहले मैंने कुनाल खेमू अभिनीत फिल्म 'ट्रैफिक सिग्नल' देखी थीफिल्म की कहानी से प्रेरित अपने जीवन की एक घटना मैं आपसे यहां शेयर कर रहा हूंउम्मीद करता हूं कि आप लोगों को पसंद आएगी

दिल्ली में जितनी ज्यादा सर्दी पड़ती है, उतना ही गर्मी से भी दो-चार होना पड़ता है। मई-जून के महीने में जब आप दिल्ली की ब्लू लाइन बस में सफ़र करते हैं तो आपके हालात और बदतर हो जाते हैं। सबसे ज्यादा हालत तो तब ख़राब होती है, जब आपकी खचाखच भरी बस किसी रेड लाइट पर खड़ी हो जाए। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ था। मई 2008 में रोजाना की तरह मैं ओखला मंडी स्थित अपने ऑफिस के लिए निकला। दोपहर का एक बज रहा था। मुनिरका से ओखला मंडी के लिए मैंने 507 पकड़ीअभी आईआईटी ही पहुंचा था कि वहां स्थित रेड लाइट पर लम्बा जाम मिल गयाहालांकि बस वहां से लेफ्ट टर्न लेती है, जिसके लिए रेड लाइट कोई मायने नहीं रखतीचूंकि जाम लम्बा था, तो इंतजार करना पड़ा

खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा मैं बाहर की ओर देख रहा थाअचानक मेरी नज़र वहां पर किताबें बेच रहे एक लड़के पर पड़ीउसकी उम्र करीब दस-बारह की साल थीहाथों में ढेर सारी किताबेंशरीर पर नाममात्र के कपड़ेतभी एक चमचमाती हुई कार वहां पर आकर रुक गईवह दौड़ता हुआ उस कार के पास पहुंचा और बोला, 'बाबू जी, किताब ले लो।' उसके इतना कहते ही कार के अन्दर एसी में बैठे व्यक्ति ने उसकी तरफ बिना देखे ही मना कर दियामेरी नज़रें उस लड़के की ओर थींकुछ देर बाद वह लड़का वहां खड़ी अन्य कारों की तरफ गया और अपने हाथ में उठाए किताबों को बेचने की कोशिश में लग गया

उस समय फिल्म देखते समय मेरी आंखों में इस बच्चे का ख्याल आ गया। ऐसे न जाने कितने बच्चे ट्रैफिक सिग्नल पर अपनी जिंदगी इस प्रकार से गुजारते हैं। सरकारी आंकड़े गरीबी कम बताने की कितनी भी हिमाकत करें, लेकिन हकीकत किसी से भी छिपी हुई नहीं है। ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगने या अपना पेट पालने के लिए कुछ न कुछ बेचने वाले न जाने कितने बच्चों को हर साल सड़कों पर अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। दिल्ली को ही ले लीजिये, कुछ दिनों बाद यहां कॉमनवेल्थ गेम्स होने वाले हैं। विदेशी मेहमानों की नज़रों में देश की छवि साफ़-सुथरी बनी रहे इसके लिए यहां के भिखारियों को दिल्ली से बाहर किया जा रहा है। लेकिन सवाल यहां पर यह है कि इन्हें राजधानी से बाहर निकालने के बजाय इनकी तरफ ध्यान देकर इनके उत्थान के लिए कोई कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है?

खैर, मैं यहां पर इस मामले में सरकार की आलोचना नहीं करुंगा, क्योंकि रेड लाइट पर अपनी जिंदगी गुज़ारने वालों की सरकार कितनी खबर लेती है यह बात किसी से नहीं छिपी है। मैं अपनी बात आगे बढ़ाता हूं। कुछ देर बाद सिग्नल ग्रीन हो गया और कुछ बसों के आगे निकलने के साथ ही मेरी बस भी अपने गंतव्य स्थान की ओर आगे बढ़ चुकी थी। मेडिकल से बस बदलकर मैं करीब एक घंटे में ऑफिस पहुंच चुका था। ऑफिस पहुंचने के बाद भी मेरी आंखों में किताब बेचने वाले का चेहरा घूम रहा था। वह लड़का जिसे शायद पढ़ना-लिखना न आता हो, वो सड़कों पर दूसरों को ज्ञान दे वाली किताबें बेच रहा था। वो किताबें जिन्हें हम ट्रैफिक सिग्नल पर बेचने वाले बच्चों से खरीदते हैं और घर जाकर मजे से पढ़ते हैं। लेकिन क्या कभी उस बच्चे के बारे में सोचते हैं जिससे हम वह किताब खरीदते हैं। वह बच्चा जो हमारे पास आकर कहता है,'बाबू जी किताब ले लो...'

Thursday, August 5, 2010

वो चुलबुली, चुलबुली ही रही


'यार हम लेट हो न हो जाएं।' अपने माथे से पसीना पौछ्ते हुए मेरी दोस्त ने मुझसे कहा। बात 2008 की उस समय की है जब मैं भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली में पढ़ता था। मेरी वह दोस्त दिल्ली यूनिवर्सिटी (साऊथ कैम्पस) से एमए कर रही थी। उसे थिएटर का भी शौक है। हम लोग नोर्थ कैम्पस जा रहे थे। 'भैया ऑटो थोड़ा तेज चलाओ न।' उसने झल्लाते हुए ऑटो चालक से कहा। उससे मेरा हाथ खींचा और मेरी कलाई पर बंधी घड़ी में समय देखा।

दिल्ली में उस समय वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। या यह कहूं कि अभी भी है। उस समय उसके कॉलेज में एक नाटक का मंचन होना था। उसकी तैयारी के लिए वो मुझे अपने साथ नोर्थ कैम्पस ले जा रही थी। धौला कुआं से हमें फैकल्टी ऑफ़ आर्ट (नोर्थ कैम्पस) पहुंचने में करीब डेढ़ घंटा लगा। 'भैया कितने पैसे हुए?' उसने ऑटो चालक से पूछा। '65 रुपए', ऑटो वाले ने मीटर देखकर कहा। उसने ऑटो वाले को पैसे दिए और मेरा हाथ पकड़कर कॉलेज में ले गई।

'हाय सीमा, यार तूने आने में कितनी देर कर दी। जरा घड़ी की तरफ देख दो बज गए हैं। और तुझे पता है न कि सर्दियों में दो बजे शाम जैसा समय हो जाता है। हम तेरा यहां पर कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं।' वहां इंतजार कर रही उसकी एक दोस्त ने उस पर थोडा गुस्सा करते हुए कहा। हां, सीमा नाम है उसका। 'सॉरी यार, थोड़ा लेट हो गई। अच्छा देखो मेरे साथ कौन आया है?' फिर क्या था, निकल गया करीब आधा घंटा एक-दूसरे के परिचय में। उसके दोस्तों के साथ उसके नाटक की रिहर्सल शुरू हुई। हिन्दू-मुस्लिम एकता पर आधारित था उसका वह नाटक। मुझे काफी पसंद आया। शाम को करीब सात बजे रिहर्सल ख़त्म हुई। 'चलें सीमा?' मैंने उससे घर चलने के लिए कहा। 'नहीं, अभी कोई नहीं जाएगा। थोड़ी भूख लगी है, कुछ खाते हैं।' उसकी एक दोस्त ने वहां पर मौजूद सभी दोस्तों से कहा।

थोड़ी सी पेट-पूजा करने के बाद हम दोनों घर की और निकल लिए। दरअसल मेरा घर उसके घर के रास्ते में ही पड़ता था। हम दोनों मेट्रो स्टेशन पहुंचे। केन्द्रीय सचिवालय का टोकन लेकर मेट्रो का इंतजार करने लगे। कुछ देर बाद मेट्रो आई और हम दोनों उसमें बैठ गए। इस समय करीब आठ बजे का समय था। ट्रेन में उसकी चुलबुली बातें शुरू हो गईं। कुछ देर बार हम केन्द्रीय सचिवालय पहुंच गए। वहां से हम दोनों को रूट नंबर 680 की बस पकड़नी थी। 'राजेश, भूख लगी है। कुछ खाते हैं', बस स्टैंड पर बस का इंतजार करते हुए उसने कहा। वहां पर हमने दो-दो समौसे खाए। कुछ देर बाद हमारी बस आ गई और हम बस में बैठकर घर के लिए चल दिए।

भोपाल में नौकरी के दौरान पिछले साल नवम्बर में किसी काम से मैं दिल्ली अपने घर गया था। उसे बताया नहीं। जब मैं लौटकर आया तो सुबह-सुबह उसका फ़ोन आ गया। मैंने बातों-बातों में उसे बता दिया कि मैं घर से आज सुबह ही आया हूं। फिर क्या था, बरस पड़ी मेरे ऊपर। जमकर गुस्सा हुई कि मैंने उसे नहीं बताया। आज उससे अलग हुए एक साल से ज्यादा हो गया है। लेकिन उसे जब भी कोई ख़ुशी होती है, उसे वो मुझसे ज़रूर शेयर करती है। इसी साल उसका जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी में पीएचडी में नंबर आ गया है और साथ ही उसे एक अख़बार में नौकरी भी मिल गई है। जब उसने मुझे फोन पर बताया तब वह बहुत खुश थी। मुझे भी उतनी ही ख़ुशी थी कि मेरी एक दोस्त अपने मकसद में कामयाब हो गई।

मुझे आज भी उसकी वो चुलबुली बातें याद आती हैं। आज भी जब वो मुझे फोन करती है, तो ऐसा लगता है कि वो मेरे सामने है। आज भी वो ऐसी ही चुलबुली है, जैसी पहले थी।

Thursday, June 24, 2010

कैसे हो न्याय की उम्मीद

भोपाल में हुई विश्व की सबसे भीषण त्रासदी के 26 साल बाद आए फैसले ने न्याय और तत्कालीन सरकार दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस त्रासदी में मुख्य भूमिका निभाने वाले यूनियन कार्बाइड कंपनी के तत्कालीन चेयरमैन वारेन एंडरसन को अमेरिका भेजने को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना भी की जा रही है। 1984 में 2-3 दिसंबर की रात इस फैक्ट्री से जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट के रिसाव से हजारों लोगों की मौत के जिम्मेदारों को 26 साल बाद निचली अदालत से सजा मिली। लेकिन जिस प्रकार से आठ आरोपियों को सजा मिली उसे देखकर लगता है कि उस रात गैस से मरे और प्रभावित हुए लाखों लोगों के साथ यह एक मज़ाक है। मात्र दो साल की कैद और प्रत्येक पर एक लाख एक हज़ार 750 रुपए का जुर्माना। फैसले के तुरंत बाद 25 हज़ार के मुचलके पर आरोपियों को जमानत मिलना। साथ ही मुख्य आरोपी एंडरसन और गैर हाज़िर चल रही दो कंपनियां कार्बाइड कॉर्पोरेशन और कार्बाइड इस्टर्न इंडिया (हांगकांग) का फैसले में उल्लेख न होना।

अब जब फैसला हो गया है तो सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी सफाई देने में लगे हैं। मुख्य आरोपी एंडरसन को भारत से अमेरिका भगाने में जहां मध्य-प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह चारों ओर से घिरे दिखाई दे रहे हैं, वहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री की भी एंडरसन को भगाने में अहम भूमिका बताई जा रही है। केंद्र सरकार ने इस कांड की परिस्थितियों की समीक्षा करने के लिए गृहमंत्री पी चिदंबरम की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय मंत्रियों का समूह बनाकर ज़िम्मेदारी की इतिश्री कर ली है।

इस त्रादसी में आरोपियों पर लगीं विभिन्न धाराओं में गैर जमानती धारा 304 भी थी, जिसे दबाव में आकर 304(a) में बदल दिया। यह दबाव किसका था? ज़ाहिर है उस समय सत्ता में बैठे लोगों का। लेकिन इसी क्या मज़बूरी थी कि धारा को बदलना पड़ा? क्या सिर्फ इसलिए कि यदि यह केस धारा 304 में चलता तो आरोपियों को अधिक सजा होती और इसके बाद विदेशी कंपनियां भारत में आने से कतरातीं? हो सकता है कि इसमें सच्चाई हो, लेकिन विदेशी कंपनियों को भारत में लाने का क्या यही अर्थ हुआ कि किसी विदेशी कंपनी की स्थापना के बदले अपने देश के लोगों की ज़िंदगी से सौदा किया जाए?

सात जून को जब इस त्रासदी पर फैसला आया तो फैसले से नाखुश होते हुए कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने बेशक कहा हो कि कानून दफ़न हो गया है, लेकिन यहां सोचने वाली बात है कि क्या कानून पहली बार दफ़न हुआ है? कानून मंत्री को क्या यह नहीं पता कि आज भी अपने देश में इतने केस हैं कि उनमें से काफी केसों के फैसले आने तक या तो मुजरिम की मौत हो जाती है या न्याय की आस में बैठे लोगों की। क्या वे इस बात को भूल गए हैं कि एक नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ के मामले में हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ को 19 साल बाद सजा मिली वह भी मात्र छह महीने और एक हज़ार रूपए के जुर्माने की। यही नहीं, एक घंटे के अंदर उसे जमानत मिल गई और फैसले के खिलाफ़ हाईकोर्ट में अपील करने का महीने भर का समय। जिस प्रकार से वह फैसले वाले दिन कोर्ट से हंसता हुआ बहार निकला, लगा मानो कानून का मखौल उड़ा रहा हो।

भोपाल गैस त्रादसी और छेड़छाड़ के अकेले ऐसे केस नहीं हैं जिन पर कोर्ट से आए फैसले से लोगों को कोई ख़ुशी हुई हो। हमें याद करना चाहिए 2006 में नोएडा में हुए निठारी हत्याकांड को। जिस प्रकार से कोठी नंबर डी-5 के पीछे नाले में से बच्चों के कंकाल बरामद हुए थे, उसे देखकर लगता था कि इसके गुनहगार जल्द ही सूली पर होंगे। लेकिन इसका फैसला आने में भी करीब चार साल लगे। ऐसा ही कुछ इस समय 2001 में संसद पर हुए हमले के आरोपी अफज़ल गुरु को लेकर हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा है, लेकिन उसकी क्षमा याचना की सुनवाई की फाइल पर अभी भी सरकारी अडचनें आ रही हैं। दिल्ली सरकार को 16 बार याद दिलाने के बावज़ूद भी फाइल आगे नहीं बढ़ी थी। वो तो भला हो दिल्ली के एक पत्रकार का जिन्होंने सूचना के अधिकार का प्रयोग करते हुए गृह मंत्रालय से अफज़ल मामले की अपडेट मांगी। मीडिया में काफी हो-हल्ला होने के बाद तब कहीं जाकर दिल्ली सरकार की नींद टूटी और फाइल ने कुछ गति पकड़ी।

वैसे भी सरकारी ढर्रे के चलते अफज़ल के दिन मजे में कट रहे होंगे, क्योंकि जब उसकी याचिका पर सुनवाई होगी तब तक काफी समय निकल चुका होगा। हमें इस बात का भी आश्चर्य नहीं होगा कि 26/11 के गुनहगार अजमल कसब की फांसी के लिए भी कुछ और महीनें या कहें कि कुछ और साल इंतजार करना पड़े। यह बात जग जाहिर है कि आतंकवादियों या गुनहगारों को सजा देने के लिए एक तो अपने देश में वैसे ही काफी समय लगता है, दूसरे यदि उन्हें किसी तरह कोर्ट से सजा मिल भी जाए तो उसे अंजाम तक पहुंचने में सालों लगते हैं। अधिकतर केसों में अपने वोट बैंक को बचाने के लिए सरकार कानून और फैसले के बीच में आ खड़ी होती है।

कहते हैं कि सांप के निकल जाने के बाद लकीर को पीटने से कुछ नहीं होता। ऐसा ही कुछ अब इन मामलों को लेकर हो रहा है। भोपाल गैस त्रासदी के बारे में कांग्रेस ने अपनी छवि पाक-साफ़ रखने के लिए इस मामले में चुप्पी साध रखी है। वहीं अर्जुन सिंह पर हो रही आरोपों की बरसात की एक भी छींट वो खुद पर लेने से बच रही है। बहरहाल जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि न्याय की आस लगाए बैठे लोगों को अभी भी न्याय से महरूम होना पड़ रहा है। कभी न्याय के आड़े सरकार आती है तो कभी धन-बल। यही नहीं सत्ता में बैठे नेता भी अपनी ताकत के बल पर या तो केस को कमज़ोर बनवा देते हैं या फिर उसे ख़त्म करवा देते हैं। आखिर हम न्याय की उम्मीद किससे और कैसे लगाए? अब समय आ गया है न्यायिक प्रक्रिया को और दुरुस्त कर उसमें से लालफीताशाही का हस्तक्षेप निकल दिया जाए, जिससे लोगों को सही और जल्दी न्याय मिल सके।